Posted in trending

Ram Temple not on SC’s priority, govt should bring law : Mohan bhagwat

MY TIMES TODAY. Addressing a ‘Jan Hunkar’ rally at Nagpur, Mohan Bhagwat said it had also been proved that the temple was there and therefore the apex court should deliver the verdict on the matter swiftly. “However, the court is not giving priority to the case. Justice delayed is justice denied,” he added.

Posted in News

वेब पर सबसे पहले : मैं राष्ट्रवाद और देशभक्ति पर बोलने आया हूं : प्रणब मुखर्जी

एमटीटी नेटवर्क। देश के लिए देशभक्ति ही प्राण होती है. आज मैं यहां अपनी भावनाओं और विचारों को शेयर करने आया हूं. मैं राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देश भक्ति को भारत के संदर्भ में जो समझता हूंं उसे आपसे साझा करने आया हूं. मैं भारत के बारे में बात करने आया हूं. यह विचार पूर्व राष्ट्रपति डॉ प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय वर्ष के कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किये. वह यहां बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे. इसके पहले उन्होंने संघ संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार को श्रंद्धांजलि भी दी. उन्होंने इस मौके पर डॉ हेडगेवार को भारत माता का महान सपूत बताया.

प्रणब मुखर्जी की बड़ी बातें :

देश भक्ति का मतलब देश के प्रति आस्था से है. हम पूरे विश्व को एक परिवार की तरह देखते हैं. यही हमारी पहचान है. भारत पूरे विश्व में सुख और शांति चाहता है. भारत में राष्ट्रवाद की परिभाषा यूरोप से अलग है. हम सभी को एक परिवार मानते हैं. हमारे राष्ट्रवाद की अवधारणा में वसुधैव कुटुम्बकं और सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया: की भावना रही है. 

अगर हम अपनी जड़ो को देखें तो पाते हैं कि भारत एक खुला समाज था, जो वैश्विक स्तर पर रेशम और स्पाइस मार्गों से जुड़ा हुआ था. वाणिज्य और विजय के ये व्यस्त राजमार्ग संस्कृति, विश्वास और आविष्कार के मुक्त आदान-प्रदान के गवाह रहे हैं. व्यापारियों, विद्वानों और संतों ने पर्वत और रेगिस्तान को पार किया और महासागरों की यात्रा की.

सहिष्णुता हमारी शक्ति है. भारत की आत्मा ‘बहुलतावाद एवं सहिष्णुता’ में बसती है. हम विविधता में एकता की पहचान हैं. 1800 साल तक भारत शिक्षा का केंद्र रहा. तक्षशिला, नालंदा, विक्रमाशिला, वालाभी, सोमापुरा और ओदांतपुरी में शिक्षा के माध्यम से भारत विश्वपटल पर अग्रणी था. विजयी होने के बाद भी अशोक शांति के पुजारी बने. सहनशीलता हमारे देश की पहचान रही है.

मुखर्जी ने राष्ट्र की अवधारणा को लेकर सुरेन्द्र नाथ बनर्जी तथा बालगंगाधर तिलक के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारा राष्ट्रवाद किसी क्षेत्र, भाषा या धर्म विशेष के साथ बंधा हुआ नहीं है. नेहरू ने भी कहा था कि सबका साथ जरूरी है. देश में सभी के विचारों को सम्मान देना हमारी परंपरा रही है. लोकतंत्र कोई उपहार नहीं है. यह निरंतर संघर्षरत्त है. हम हम अपनी विरासत को बनाएं रखे.

हमनें कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक देश के लिए एक सपना संजोया हैं. यह 1.3 अरब लोगों की सार्वभौमिकता’ है जो अपने दैनिक जीवन में 122 से अधिक भाषाओं और 1600 बोलियों का उपयोग करते हैं, 7 प्रमुख धर्मों का अभ्यास करते हैं, फिर भी ध्वज एक है. पहचान एक है. हम सभी भारतीय हैैं. 

सदियों से औपनिवेशिक शासन द्वारा बनाई गई गरीबी के दलदल से शांति और पुनरुत्थान की दिशा में ले जाने में लोकतंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. 

भारतीय संविधान, जिसमें 395 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां शामिल हैं, केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं बल्कि देश के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का अधिकार पत्र है जो अरबों भारतीयों के आकांक्षाओं और उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करता है. 

लोकतंत्र में राष्ट्रीय महत्व के सभी मुद्दों पर संवाद आवश्यक है. हम सहमत या असहमत हो सकते है. लेकिन देश की समस्याओं के समाधान के लिए संवाद होना जरूरी है. हमें शांति की ओर बढ़ना हो तभी हम भारत का विकास कर सकते है. हमारा दायित्व होना चाहिए कि हम मातृभूमि के लिए कार्य करें. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, करुणा, जीवन के प्रति सम्मान, और प्रकृति के साथ सद्भावना हमारी सभ्यता की नींव है।

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् ।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ।।

सरकार लोगों के लिए और लोगों के सुख के लिए होना चाहिए. लोगों की खुशी में राजा की खुशी है, उनका कल्याण उसका कल्याण है. हम सभी मिलकर शांति, सद्भाव और खुशी फैलाने के उद्देश्य से राज्य और नागरिकों को उनके दैनिक जीवन में मार्गदर्शन करें

हम सब एक है मोहन भागवत…

इस मौके पर मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि संघ संपूर्ण समाज को संगठित करना चाहता है. हमारे लिए सभी भारतवासी एक है. विविधता में एकता ही हमारी पहचान है. इस भूमि पर जन्मा हर व्यक्ति भारत पुत्र है.

मोहन भागवत की बड़ी बातें : 

यह कार्यक्रम प्रतिवर्ष होता है. जिसमें हम सम्मानित व्यक्तियों को बुलाते हैं और उनकी बातों को पाथेय मानकर उसका अनुसरण भी करते हैं.आज इस कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी शामिल हुए है, इसका विरोध ठीक नहीं है. संघ संघ है और प्रणब मुखर्जी प्रणब मुखर्जी है.

हमारे आपस में मत्तों का अंतर हो सकता है. लेकिन हम सभी भारत माता के पुत्र है. हम सभी भारत माता को परम वैभव तक ले जाना चाहते है. मोहन भागवत ने कहा कि सरकारें बहुत कुछ कर सकती है लेकिन सबकुछ नहीं. कुछ कार्य हमें भी करना चाहिए.

सबकी माता भारत माता है. सभी के पूर्वज समान है. संगठित समाज ही भारत की पूंजी है. संगठित समाज से ही देश बदल सकता है.

विचार कुछ भी हो, जाति पात प्रांत पक्ष कोई भी हो ,लेकिन संपूर्ण समाज के विकास में हमारा व्यक्तिगत योगदान क्या हो सकता है. यह महत्वपूर्ण है.

संघ डेमोक्रेटिक मांइड वाला संगठन है. किसी भी कार्य को करने के लिए शक्ति चाहिए . यह सच है और संगठन से ही शक्ति होती है. इसलिए संगठित होना आवश्यक है. शक्ति कभी भी दूसरों को कष्ट देने के लिए नहीं होता है. शक्ति का उपयोग रक्षा के लिए करना चाहिए.

सब बाधाओं के बाद भी संघ चल रहा है. संघ ने प्रतिकुलता को अनुकुलता में बदल दिया है. लेकिन हमें रूकना नहीं है. हमें सत्तत कार्य करते रहना है. इसीलिए संघ हर वर्ष कार्यकर्ता तैयार करने के लिए प्रशिक्षण वर्ग आयोजित करता है. यहां आने पर लगता है कि सभी भारतीय हमारे अपने है. यहां आने पर अपनत्व की अनुभूति होती है. हम सज्जन शक्ति को एकत्र करना चाहते है. हमें विचारों से मत्तों से कोई परहेज नहीं है. गंतव्य एक होना चाहिए. भारत को विश्व गुरू बनाने का लक्ष्य होना चाहिए.

हम सत्य पथ पर चलें, यह हमारी आदत में होना चाहिए. संघ के कार्य का प्रत्यक्ष अनुभव करना जरूरी है. संघ को परखिए. अगर संघ सही लगे तो उसमें सहयोग करें.[pfc layout=”layout-one” cat=”0″ order_=”date” order=”DESC” post_number=”5″ length=”10″ readmore=”Read More” show_date=”true” show_image=”true” image_size=””]