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यशवंत सिन्हा के बयान के बाद सरकार हो सकता है जीएसटी पर कुछ राहत दे


mytimestoday.सरकार ने संकेत दिया है कि भविष्य में वह जीएसटी के स्लैब को घटा सकती है. वर्तमान में चार प्रकार के जीएसटी देश में लागू है.
अरुण जेटली ने नेशनल एकेडमी ऑफ कस्टम्स, इनडायरेक्ट टैक्सेज एंड नारकोटिक्स (एनएसीआईएन) के स्थापना दिवस के मौके पर येे बात कही. जेटली के मुताबिक, मौजूदा जीएसटी प्रणाली के कर स्लैब तभी घटाए जाएंगे, जब राजस्व निर्धारित सीमा से अधिक आएगा. गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने एक जुलाई से देशभर में सभी अप्रत्यक्ष करों के स्थान पर एक नई कर प्रणाली जीएसटी लागू की है.

जेटली ने कहा, ‘‘हमारे पास इसमें दिन के हिसाब से सुधार करने की गुंजाइश है. हमारे पर सुधार की गुंजाइश है और अनुपालन का बोझ कम किया जा सकता है. खासकर छोटे करदाताओं के मामले में.’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमारे पास सुधार की गुंजाइश है. एक बार हम राजस्व की दृष्टि से तटस्थ बनने के बाद बड़े सुधारों के बारे में सोचेंगे. मसलन कम स्लैब. लेकिन इसके लिए हमें राजस्व की दृष्टि से तटस्थ स्थिति हासिल करनी होगी.’’

वर्तमान समय में देश में कर के चार स्लैब: 

मौजूदा समय में देश में कर के चार स्लैब यानी पांच प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत और 28 प्रतिशत हैं. इसके साथ ही जीएसटी लागू होने के शुरुआती पांच वर्षो में राज्य सरकारों को होने वाले राजस्व घाटे की भरपाई के लिए कार, बोतलबंद पेय, तंबाकू उत्पाद जैसे लग्जरी सामानों पर अतिरिक्त कर का भी प्रावधान है. जीएसटी के तहत 81 फीसदी सामानों पर 18 फीसदी या इससे कम कर है और सिर्फ 19 फीसदी सामानों पर अधिकतम 28 फीसदी कर है.

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नोटबंदी पर सरकार का साथ देने वाले अब जीएसटी पर खुद को ठगा महसूस कर रहे है


mytimestoday.com। हमारे प्रधानमंत्री जी गरीबी में पले बढ़े है, उनका बचपन अभाव और मजबूरी में गुजरा है। तमाम मुश्किलों के बाद पीएम मोदी चाय बेचने वाले से संसद तक का सफर किये है। यकिनन मोदी का यह सफर चुनौती भरा रहा है। लोकसभा चुनाव के दौरान भी मोदी को गरीब का बेटा, चाय बेचने वाले के रूप में सामने लाया गया। शायद गरीबों के वोट बैंक पर सेंधमारी में मोदी इसलिए भी कामयाब हुए कि लोगों ने उनको गरीबों का मसीहा समझा, लोगों को लगा कि एक गरीब के पीएम बनने के बाद गरीबों की आवाज जो अबतक सिर्फ सड़कों तक सीमित रह जाती थी वो अब संसद तक पहुंचेगी। नयी सरकार उनके लिए नयी नयी योजनाओं की सौगात लाएगी और अच्छे दिन के वादे को निभाएगी। इसतरह मोदी अपने तमाम लोक लुभावन वादों से चुनाव जीतने में कामयाब हो गए और लगभग साढ़े तीन साल उनके शासन के पूरे भी हो गए। सरकार अपने तीन साल के कार्यकाल का गुणगान तो करती है, मोदी भी जहां जाते है अपनी सरकार की तारीफ करते नहीं थकते । अब प्रश्न यह है कि क्या तीन साल बाद लोगों के अच्छे दिन आ गए ? क्या सरकार अपने वादों को पूरा कर पायी है ? क्या किसानों का मन आज भी उनके खेतों की तरह बंजर ही है? ऐसे तमाम सवाल सरकार से पूछे जा रहे है और लोकतंत्र में पूछे भी जाने चाहिए। देश की जनता ने वोट भी तो इसलिए ही दिया था कि सरकार काला धन वापस लाएगी और उनके खातों में पैसे आयेंगे। ये और बात है कि सरकार ने इससे जुमला कह अपना पल्ला झाड़ लिया। ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने काम नहीं किया। सरकार ने उज्जवला योजना, समृद्धि योजना जैसी कुछ योजनाओं को बहाल कर लोगों को थोड़ी बहुत राहत तो दी पर इतना पर्याप्त नहीं है। आज भी गरीबों के साथ साथ मध्यम वर्ग के लोगों के हालात कुछ ज्यादा नहीं बदले है। जमीनी हकिकत पर सरकार आज भी अपने वादे को निभाने में नाकाम ही रही है। मोदी सरकार ने आनन फानन में जिसतरह से नोटबंदी किया, उससे लोगों को लगा कि शायद अब काला धन वापस आ जाएगा, अब उनके खातों में पैसे आएंगे। आपको याद होगा कि नोटबंदी के दौरान लोगों ने तमाम मुश्किलों को सहते हुए, दिन – दिन भर लाईन में लगकर भी नोटबंदी के दंश को झेला। लोगों को लगा कि सरकार के इस फैसले में साथ देना चाहिए और लोगों ने सरकार का साथ भी दिया। पर नोटबंदी के लगभग एक साल बाद भी लोगों को कुछ हाथ नहीं लगा, काला धन कहां गया कुछ पता ही नहीं चला। आरबीआई की रिपोर्ट ने तो नोटबंदी पर सरकार का समर्थन करने वाले लोगों का कमर ही तोड़ दिया। जिस तरह से देश की जीडीपी को नुकसान पहुंचा है, आर्थिक दर कम हुआ है वह भारत जैसे प्रगतिशील देश के लिए चिंताजनक है। इतना ही नहीं लोग अभी नोटबंदी के मार से ठीक से उठे भी नहीं थे कि सरकार ने जीएसटी लाकर फिर से नया गेम खेल दिया। सरकार ने जीएसटी के अनेक फायदे तो गिनाए पर वास्तविकता के धरातल पर रोटी कपड़ा मकान जैसी बुनियादी जरूरते भी पहले से कहीं अधिक महंगी हो गयी। आधी अधुरी तैयारी से नोटबंदी के बाद जीएसटी को लाना आज जनता के लिए महंगा पड़ रहा है। विपक्ष तो सरकार की घेराबंदी कर ही रहा है, साथ ही साथ देश की जनता भी सरकार से अपने अच्छे दिनों का हिसाब मांग रही है। लोग कह रहे हैं कि नोटबंदी कम थी क्या जो जीएसटी लाकर हमारी कमर ही तोड़ दी। निश्चित ही नोटबंदी पर तमाम तरह की परेशानियों को सह कर भी सरकार का साथ देने वाले आज जीएसटी पर खुद को ठगा ही महसुस कर रहे है। यशवंत सिन्हा ने जिसतरह से अरूण जेटली को घेरा है उससे इतना तो साफ है कि सरकार नोटबंदी और जीएसटी के बाद बैकफुट पर है।