Posted in News

हिंदी दिवस विशेष लेख : हिन्दी संसार: अपार विस्तार

मॉय टाइम्स टुडे। हिंदी दिवस विशेष। 
हिन्दी अपने आविर्भाव काल से लेकर अब तक निरन्तर जनभाषा रही है। वह सत्ता की नहीं जनता की भाषा है। उसका संरक्षण और संवर्द्धन सत्ता ने नहीं, संतों ने किया है। भारतवर्ष में उसका उद्भव और विकास प्रायः उस युग में हुआ जब फारसी और अंग्रेजी सत्ता द्वारा पोषित हो रही थीं। मुगल दरबारों ने फारसी को और अंग्रेजी शासन ने अंगे्रजी को सरकारी काम-काज की भाषा बनाया। परिणामतः दरबारी और सरकारी नौकरियाँ करने वालों ने फारसी और अंग्रेजी का पोषण किया। मुगल सत्ता पोषित फारसी मुगल शासन के साथ ही भारतवर्ष से विदा हो गई। अंग्रेजों के जाने के बाद भी स्वतंत्र भारत के शासन में बने रहने से अंग्रेजी का वर्चस्व समाप्त नहीं हुआ, तथापि हिन्दी उत्तरोत्तर विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित होने में सफल रही है, क्योंकि उसकी जड़ें जनता में दृढ़ता से जमी हंै। वह सत्ता की निधि नहीं, जनता की निधि है। सत्ताएं बदलती रहती हैं, उनके साथ ही उनके विधान और उनसे पोषित व्यक्ति, मान्यताएं, रीतियाँ आदि भी बदल जाती है किन्तु जनता महासागर के अपार प्रवाह की भाँति सतत तरंगायित रहती है। उसका स्वरूप चिर पुरातन और नित नवीन होता है। इसीलिए उससे पोषित निधियाँ भी चिरंजीवी रहती हैं। वे रूप-परिवर्तन के वावजूद अपने वैशिष्ट्य में विद्यमान बनी रहती हैं। यही तथ्य हिन्दी के साथ भी प्रमाणित होता है। हिन्दी अपने संसार में सतत सवंर्द्धित होती हुई विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है।
यह दुखद है कि उन्नीसवीं शताब्दी में जहाँ विदेशी विद्वान तक हिन्दी की सेवा के लिए समर्पित रहे वहाँ बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी की भारतीय राजनीति हिन्दी के गौरव की प्रतिष्ठा के लिए उदासीन मिलती है। हिन्दी को विश्व स्तर पर गौरव प्रदान करने वाले विद्वानों में न केवल अंग्रेज अपितु जर्मन, फ्रांस, रूस, पुर्तगाल, हालैंड आदि अनेक देशों के हिन्दी सेवी विद्वानों का योगदान भी अविस्मरणीय और स्पृहणीय है। जिन भारतीयों की दृष्टि में हिन्दी ‘हीन है’, समृद्ध नहीं है’, ‘राष्ट्रभाषा पद के लिए उपयुक्त नहीं है’ – जैसी अनेक भ्रान्तियाँ हैं उन्हें इस संदर्भ में पूर्वाग्रह त्यागकर विचार करना चाहिए कि यदि भाषा के स्तर पर हिन्दी में कहीं कोई कमी होती तब न तो वह राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना विकास कर पाती और न ही विदेशी-अहिन्दी भाषी विद्वानों की सेवाएं और समर्थन उसे प्राप्त होते। हिन्दी के प्रति दुराग्रह और पूर्वाग्रह त्यागकर ही हम उसके साथ, अपने साथ और विश्व-परिवार के साथ न्याय कर सकते हैं क्योंकि हिन्दी में सुलभ मूल्य-चेतना से सबका हित जुड़ा है।
हिन्दी-साहित्य का विस्तार भी सागर के प्रसार की भाँति अपार है। उसका लिखित साहित्य आठवीं शताब्दी में ‘सरहपा’ से लेकर आज तक निरन्तर रचा जा रहा है। लोकसाहित्य और अप्रकाशित-अमुद्रित साहित्य के रूप में भी वह भारत और भारत से बाहर तक विस्तार पाता रहा है। उसकी साहित्यिक उपभाषाएँ क्षेत्रीय धरातल पर पिंगल, डिंगल, रेख्ता आदि विविध शैलियों में विपुल साहित्य रचती रही हैं। पद्य के क्षेत्र में आदिकाल से आधुनिक काल तक असंख्य रचनाएँ अस्तित्व में आयीं तो गद्य के संदर्भ में विगत दो शताब्दियों में ही अपरिमित साहित्य का सृजन हुआ है। हिन्दी की यह विपुल साहित्य-सृष्टि विश्व की किसी भी अन्य भाषा के समृद्ध साहित्य से कम नहीं है। विश्व-स्तर पर इसकी प्रतिष्ठा का यह महत्त्वपूर्ण आयाम है।
आज हिन्दी शिक्षण, प्रशिक्षण, अनुसंधान और सृजन के विस्तृत परिसर से बाहर जीवन के अन्यान्य क्षेत्रों में भी उत्तरोत्तर प्रगति कर रही है। संपर्क और संचार के स्तर पर प्रतिष्ठित हिन्दी वित्त-वाणिज्य-बैंकिंग एवं बीमा के असीम कार्य भी संपादित कर रही है। विज्ञान, तकनीकि एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वह प्रसार पा रही है। प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडिया के विविध समाचार चैनलों की भाषा हिन्दी-विज्ञापनों का भाषिक मेरूदण्ड है। क्रीड़ा, मनोरंजन, सांस्कृतिक-प्रस्तुति, अभिनय, कम्प्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल, ई-मेल पेजर, बैनर, पोस्टर, हैंडबिल आदि क्षेत्रों में हिन्दी प्रगति पर है। हिन्दी-भाषियों के संख्यात्मक विस्तार के साथ-साथ हिन्दी का व्यवहार घर-बाहर सर्वत्र प्रगति पर है। राष्ट्रभाषा, राजभाषा, संचार-भाषा, शिक्षण, अनुवाद, प्रशासन, न्यायालय इत्यादि जीवन के विविध-संदर्भ हिन्दी से जुड़कर कार्य कर रहे हैं। इससे हिन्दी की शक्ति एवं सामथ्र्य वृद्धि सर्वत्र सिद्ध होती है।
हिन्दी विश्व की सार्थकता और विस्तार उसके भविष्य की स्वर्णिम संभावनाओं के प्रति आशान्वित करती हैं। हिन्दी भारतवर्ष की अस्मिता है। उसके माध्यम से ही विश्व में भारतीयता अभिव्यक्ति पाती रही है, पा रही है। हिमालय से सागर-पर्यन्त प्रसृत समस्त भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता, नैतिकता, सर्वभौम दर्शन और ज्ञान-विज्ञान विश्व में हिन्दी के माध्यम से प्रकाशित प्रसारित हो रहे हैं। इस प्रकार हिन्दी भारत और भारतेतर विश्व के मध्य संपर्क का स्वर्ण सूत्र है। भविष्य में इस स्वर्ण-सूत्र के सुदृढ़ होने की प्रबल संभावनाएं हैं।

डाॅ. कृष्णगोपाल मिश्र
विभागाध्यक्ष-हिन्दी
शासकीय नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय
होशंगाबाद म.प्र.

Posted in Sports

जरूरी है हिन्दीपन – लोकेंद्र सिंह

लोकेंद्र सिंह। भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है। बल्कि, इससे इतर भी बहुत कुछ है। भाषा की अपनी पहचान है और उस पहचान से उसे बोलने वाले की पहचान भी जुड़ी होती है। यही नहीं, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक भाषा का अपना संस्कार होता है। प्रत्येक व्यक्ति या समाज पर उसकी मातृभाषा का संस्कार देखने को मिलता है। जैसे हिन्दी भाषी किसी श्रेष्ठ, अपने से बड़ी आयु या फिर सम्मानित व्यक्ति से मिलता है तो उसके प्रति आदर व्यक्त करने के लिए ‘नमस्ते’ या ‘नमस्कार’ बोलता है या फिर चरणस्पर्श करता है। ‘नमस्ते’ या ‘नमस्कार’ बोलने में हाथ स्वयं ही जुड़ जाते हैं। यह हिन्दी भाषा में अभिवादन का संस्कार है। अंग्रेजी या अन्य भाषा में अभिवादन करते समय उसके संस्कार और परंपरा परिलक्षित होगी। इस छोटे से उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि कोई भी भाषा अपने साथ अपनी परंपरा और संस्कार लेकर चलती है। किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। संस्कृति क्या है? हमारे पूर्वजों ने विचार और कर्म के क्षेत्र में जो भी श्रेष्ठ किया है, उसी धरोहर का नाम संस्कृति है। यानी हमारे पूर्वजों ने हमें जो संस्कार दिए और जो परंपराएं उन्होंने आगे बढ़ाई हैं, वे संस्कृति हैं। किसी भी देश की संस्कृति उसकी भाषा के जरिए ही जीवित रहती है, आगे बढ़ती है। जिस किसी देश की भाषा खत्म हो जाती है तब उस देश की संस्कृति का कोई नामलेवा तक नहीं बचता है। यानी संस्कृति भाषा पर टिकी हुई है।
भारत में अंग्रेजी ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है, ऐसा कहा जाता है। दरअसल, यह नुकसान अंग्रेजी भाषा से कहीं अधिक उसके संस्कार और परंपरा ने पहुंचाया है। अंग्रेजी के स्वभाव के लिए एक शब्द है ‘अंग्रेजियत’। भारत का सबसे अधिक नुकसान अंग्रेजी ने नहीं बल्कि उसके स्वभाव अंग्रेजियत ने किया है। इसलिए जब हम हिन्दी को सम्मानित स्थान दिलाने की बात करते हैं तो हमारा किसी भाषा से विरोध नहीं है। बल्कि, हम हिन्दी से आए अपने संस्कारों के प्रति आग्रही हैं। भाषा तो जितनी सीखी जा सकती हैं, सीखनी ही चाहिए। लेकिन एक बात ध्यान रखने की है कि जब हम किसी भाषा को सीखते हैं तो उसके ‘एटीट्यूड’ (प्रवृत्ति) को भी सीखते हैं। विदेशी भाषा सीखने के दौरान हमें उसके एटीट्यूड को इस तरह लेना चाहिए कि वह हमारी भाषा के एटीट्यूड पर हावी न हो पाए। अगर यह कर सके तो कोई दिक्कत नहीं। यह सब करने के लिए हमें अपनी मातृभाषा के एटीट्यूड को ज्यादा अच्छे से समझ लेना चाहिए बल्कि उससे अधिक प्रेम कर लेना चाहिए। हिन्दी का आंदोलन चलाने वाले प्रख्यात पत्रकार वेदप्रताप वैदिक अपनी पुस्तक ‘अंग्रेजी हटाओ, क्यों और कैसे’ में लिखते हैं- ‘जब आप विदेशी भाषा से इश्क फरमाते हैं तो वह उसकी पूरी कीमत वसूलती है। वह अपने आदर्श, अपने मूल्य आप पर थोपने लगती है। यह काम धीरे-धीरे होता है। सौंदर्य के उपमान बदलने लगते हैं। दुनिया को देखने की दृष्टि बदल जाती है। आदर्श और मूल्य बदल जाते हैं… आप रहते तो भारतीय परिवेश में लेकिन बौद्धिक रूप से समर्पित होते हैं अंग्रेजी परिवेश के प्रति। ऐसा व्यक्त्वि सृजनशील नहीं बन पाता है।’
हिन्दी को सम्मान दिलाने के लिए, उसकी श्रेष्ठता साबित करने के लिए हमें उसके स्वभाव को समझ लेना चाहिए। हिन्दी का स्वभाव, उसकी पहचान और उसके संस्कार को ‘हिन्दीपन’ कह सकते हैं। यह बहुत सहज है, सरल है। बनावटी बिल्कुल नहीं है। भारतीय परंपरा और संस्कृति इस शब्द में परिलक्षित होती है। ‘हिन्दीपन’ हमेशा ध्यान रखा तो दूसरी विदेशी भाषाएं सीखते समय उनका स्वभाव हम पर हावी नहीं हो सकेगा। हम ‘हिन्दीपन’ के साथ अच्छी अंग्रेजी बोल-पढ़ और लिख सकेंगे। ऐसे में हम ‘अंग्रेजीदां’ होने से भी बच जाएंगे। हिन्दी का साथ नहीं छूटेगा। हम अंग्रेजी बोलने के बाद भी ‘हिन्दी’ ही कहलाएंगे। हिन्दीपन को जीवित रखा तो अपनी माटी से हम जुड़े रहेंगे। ‘हिन्दीपन’ के साथ अंग्रेजी सीखे तो राम को राम कहेंगे, कृष्ण को कृष्ण। वरना तो बरसों से अंग्रेजीदां लोगों के लिए राम ‘रामा’ हो गए और कृष्ण ‘कृष्णा’। भारत भी उनके लिए कब का ‘इंडिया’ हो चुका है। भारत को भारत या हिन्दुस्थान कहने का विरोध वे ही लोग करते हैं, जिनमें ‘हिन्दीपन’ बचा नहीं रहा है। अगर हिन्दीपन के महत्व को हमने समझ लिया तो एक और महत्वपूर्ण कार्य यह हो जाएगा कि सभी भारतीय भाषाएं एक साथ खड़ी हो जाएंगी। क्योंकि, सबका स्वभाव तो ‘हिन्दी’ ही है। यानी इस देश की माटी की सुगन्ध सभी भाषाओं में है। सब भाषाएं हिन्दुस्थान की माटी में उसकी हवा-पानी से सिंचित हैं। सबका विकास भारतीय परिवेश में ही हुआ है- इसलिए सबका संस्कार एक जैसा होना स्वभाविक है। हिन्दीपन के साथ हम भारतीय भाषाओं के बीच खड़ी की गई दीवार को भी गिरा सकते हैं। अच्छी अंग्रेजी के जानकार और विलायत में पढ़े-लिखे महात्मा गांधी ने आजीवन ‘हिन्दीपन’ को संभाले रखा। इसीलिए गुजराती भाषी होने के बावजूद वे हिन्दी से अथाह प्रेम करते रहे। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अथक प्रयास भी उन्होंने किए। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी गुजराती भाषी हैं लेकिन हिन्दी के सम्मान को बढ़ाने का काम वे भी बखूबी कर रहे हैं।
भाषा नागरिकता की पहचान भी होती है। मशहूर कवि इकबाल ने भी कहा था कि ‘हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा’। यहां इकबाल ने भारत के नागरिकों को हिन्दी कहकर संबोधित किया है। भारत में रहने वाले प्रत्येक समाज-पंथ-धर्म के लोगों की भारत के बाहर पहचान ‘भारतीय’ ही है। यानी ‘हिन्दी’। भले ही स्वार्थ की राजनीति करने वाले, विभेद पैदा करके प्रसन्न रहने वाले लोग भारत की नागरिकता ‘भारतीयता’ के नाम पर विभिन्न पंथ के अनुयायियों के बीच वैमनस्यता फैलाने का प्रयास करते हों, लेकिन यह सच है कि भारत के बाहर हिन्दू-मुसलमान-ईसाई सबकी पहचान भारतीयता ही है। अरब देशों में जाने वाले मुसलमानों, खासकर हज के लिए जाने वाले मुसलमानों को वहां की शासन व्यवस्था और स्थानीय नागरिक सभी ‘हिन्दी मुसलमान’ के नाते पहचान करते हैं। यानी ‘हिन्दी’ केवल हिन्दी बोलने वाले, हिन्दू धर्म को मानने वाले लोग ही नहीं हैं बल्कि भारत में रहने वाले समस्त लोग ‘हिन्दी’ में शामिल हैं। इस नाते हिन्दी महज अभिव्यक्ति का साधन नहीं है बल्कि यह लोगों को जोडऩे का एक सेतु भी है। हिन्दी हमें पंथ-धर्म से ऊपर उठाकर एकसाथ लाती है। और हिन्दीपन इस भाषा की आत्मा है, जो हमें अधिक सरल, उदार और श्रेष्ठ बनाए रखता है।
——————————————————————
लेखक परिचय : युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह ‘देश कठपुतलियों के हाथ में’ और काव्य संग्रह ‘मैं भारत हूं’ प्रकाशित हो चुका है।
संपर्क :
मोबाइल : 9893072930
ईमेल : lokendra777@gmail.com