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माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय को मिला सर्वश्रेष्ठ जनसंचार संस्थान का सम्मान

भोपाल, 22 नवंबर। पब्लिक रिलेशन्स सोसायटी ऑफ इंडिया नेशनल काउंसिल द्वारा ‘राष्ट्रीय अवार्ड-2018’ के अंतर्गत माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय को सर्वश्रेष्ठ जनसंचार संस्थान अवार्ड प्रदान किए जाने की घोषणा की गई है। बता देंं कि पीआरएसआई प्रतिवर्ष 28 श्रेणियों में राष्ट्रीय पुरस्कार देती है। सर्वश्रेष्ठ जनसंचार संस्थान श्रेणी का पुरस्कार पहली बार माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय को 8 से 10 दिसंबर तक देहरादून में आयोजित होने वाली 40वीं राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में दिया जाएगा। उक्त पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. श्रीकांत सिंह, डॉ. संजीव गुप्ता, डॉ. अनुराग सीठा एवं डॉ. अविनाश बाजपेयी देहरादून जायेंगे।

पीआरएसआई ‘राष्ट्रीय अवार्ड-2018’ के निर्णायक मंडल में पीआरएसआई की महासचिव सुश्री निवेदिता बनर्जी, गर्वनेंस नाउ के संपादक आशीष मेहता, बिजनेस इंडिया की सह-संपादक येशी सेली, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वाज़ाहत हबीबउल्लाह, बाल अधिकारों के संरक्षण राष्ट्रीय आयोग की अध्यक्ष स्तुति काकर, भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त मधाभूषी श्रीधर, नईदिल्ली प्रबंधन संस्थान के अध्यक्ष वीएम बंसल एवं पीआरएसआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अजीत पाठक शामिल थे। इस उपलब्धि का श्रेय कुलपति जगदीश उपासने, कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा और कुलसचिव प्रो. संजय द्विवेदी ने विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, विद्यार्थियों एवं कर्मचारियों को दिया।

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जब तक मजबूरी न हो, देवनागरी में ही लिखें : डॉ. नरेन्द्र कोहली

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में हिंदी दिवस प्रसंग पर विशेष व्याख्यान का आयोजन

माय टाइम्स टुडे। प्रख्यात साहित्यकार डॉ. नरेन्द्र कोहली ने कहा कि मातृभाषा हिंदी के प्रति हीनता का भाव होने के कारण हम प्राचीन ज्ञान विरासत से अलग हो गए, भारतीयता से विमुख हो गए। हमें अपनी भाषा को सम्मान देना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों को संकल्प दिलाया कि जब तक कोई मजबूरी न हो, तब तक देवनागरी लिपि में ही हिंदी लिखें और अपनी भाषा को विकृत न होने दें। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में हिंदी दिवस प्रसंग पर विशेष व्याख्यान में डॉ. कोहली ने हिंदी भाषा के प्रति भारतीयों के व्यवहार को लेकर चिंता जताई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने की।

हिंदी साहित्य के प्रख्यात उपन्यासकार डॉ. कोहली ने कहा कि तुर्क, अरबी और अफगानी हमलावरों ने भारत में सबसे पहले संस्कृत पाठशालाएं बंद कीं और फिर तक्षशिला एवं नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों को जलाकर भोजन पकाया। पुस्तकों के नष्ट होने से हमारा ज्ञान राख में मिल गया। सोच-विचार कर हमारे ज्ञान और भाषा को समाप्त करने के लिए किया गया था। संस्कृत भाषा हमसे छीन ली गई, जिसके कारण संस्कृत में रचा गया ज्ञान-विज्ञान भी हमसे छिन गया। उन्होंने कहा कि संस्कृत में रचा गया साहित्य और ज्ञान हमारे सामने नहीं है। हमें यह तो पढ़ाया जाता है कि शून्य का आविष्कार आर्यभट्ट ने किया, लेकिन हमारे पाठ्यक्रम में आर्यभट्ट के गणित को नहीं पढ़ाया जाता, क्योंकि वह संस्कृत में है।

270 वर्ष में दो प्रतिशत सीख पाए अंग्रेजी :

डॉ. कोहली ने कहा कि अंग्रेजों के 200 वर्ष के शासनकाल और स्वतंत्रता के बाद 70 वर्षों में हमें अंग्रेजी पढ़ाई गई। इसके बावजूद भारत में दो प्रतिशत से अधिक लोग अंग्रेजी नहीं जानते। हमने यह मान लिया है कि भारत में कुछ है ही नहीं या फिर जो कुछ है, वह निम्न कोटि का है। इस मानसिकता के कारण हम अपनी भाषा से ही नहीं, वरन भारतीयता से भी विमुख हो गए। जब कमाल पाशा ने सत्ता संभाली तो उसने सबसे पहले तुर्की भाषा को अनिवार्य किया। माओ त्से तुंग ने चीन में चीनी भाषा को लागू किया और इसी तरह इजरायल ने लगभग समाप्त हो चुकी अपनी भाषा हिब्रू को जीवित किया। उन्होंने कहा कि हम सभी प्रकार के पत्र हिंदी में ही लिखें, इसके लिए सरकारी आदेश की प्रतीक्षा क्यों करें? आज दुनिया में हिंदी भाषा-भाषियों की संख्या करोड़ों में है, लेकिन यह लोग अपनी भाषा में लिखते-पढ़ते नहीं है। जब हम हिंदी में लिखेंगे-पढ़ेंगे नहीं, तब वह समृद्ध कैसे होगी? उन्होंने कहा कि हमें संकल्प करना चाहिए कि अपनी भाषा से प्रेम करेंगे, सम्मान करेंगे और उसे विकृत नहीं होने देंगे। उन्होंने हिंदी के संदर्भ में विद्यार्थियों की जिज्ञासा का समाधान किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा प्रायोगिक तौर पर प्रकाशित समाचार पत्र ‘पहल’ के हिंदी दिवस विशेषांक का भी विमोचन किया गया।

श्रेष्ठ भाषा का चुनाव करें : कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि यदि हम हिंदी का वैभव लाने का संकल्प लें, तब धीरे-धीरे पत्रकारिता भी बदल जाएगी। हमें शुद्ध हिंदी का प्रयोग करना चाहिए। उसे संवारना और समृद्ध करना चाहिए। नये शब्द गढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनसंचार माध्यमों को समाज का अनुकरण नहीं, बल्कि नेतृत्व करना चाहिए। भाषा और विचार के क्षेत्र में भी जनसंचार माध्यमों को समाज को दिशा देनी चाहिए। हम श्रेष्ठता को चुनते हैं। इसलिए बोलचाल के नाम पर हिंदी को बिगड़े नहीं, बल्कि शुद्ध हिंदी शब्दों का उपयोग करें। दुनिया में सबसे अधिक श्रेष्ठ भाषा संस्कृत हैं और उसके निकट है हिंदी। प्रो. कुठियाला ने कहा कि जनमानस यदि तय कर ले कि हिंदी को बढ़ाना है, तब राजनीति स्वत: उसका अनुकरण करेगी। उन्होंने कहा कि देश हित में अंग्रेजी और अंग्रेजियत से छुटकारा पाना है,उसके लिए हिंदी और हिंदीपन को लाना होगा। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव दीपक शर्मा, समस्त शिक्षकगण एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

 

(डॉ. पवित्र श्रीवास्तव)

निदेशक, जनसंपर्क : एमसीयू भोपाल