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सैद्धांतिक रूप से भारत आज भी परतंत्र है : पुरी पीठाधीश्वर


माय टाइम्स टुडे। भोपाल । शुक्रवार को नगर के मानस भवन मेें ‘वर्तमान परिस्थिति में धर्म के प्रति हमारा कर्तव्य’ विषय पर बोलते हुए पुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी ने कहा कि आज हम भले स्वतंत्र है लेकिन सैद्धांतिक रूप से हम स्वतंत्र नहीं है. हमारे देश में न तो विकास के माध्यम अपने हैं न ही सेवा के प्रकल्प अपने हैं. हमारे सविंधान की आधारशीला हमारी नहीं है. सैद्धांतिक धरातल पर हम आज भी परतंत्र ही है. उन्होंने गौहत्या को लेकर कहा यूपी में वैध और अवैध बूचड़खाने खाने के नाम पर जो राजनीति हो रही है वह ठीक नहीं है. दोनों ही स्थितियों में गौवंश की हत्या हो रही है.

भौतिक विकास के नाम पर सनातन परंपरा को तोड़ा जा रहा है : 

पुरी पीठाधीश्वर ने विकास को लेकर भी कड़ा प्रहार किया. उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर हमारे सामर्थ्य को खत्म किया जा रहा है.भौतिक विकास का प्रलोभन देकर हमारी सनातन परंपरा को खत्म किया जा रहा है. शिक्षा पद्धति को लेकर स्वामी जी ने कहा कि आज के दैर में शिक्षा को बाजार बना दिया गया है.

व्यास पीठ में संशोधन की आवश्यकता है : 

पुरी पीठाधीश्वर ने व्यास परंपरा को लेकर भी कड़ा प्रहार किया. उन्होंने कहा कि फलां संत भाजपा के है, फलां संत कांग्रेस के है, ऐसी परंपरा देश के लिए घातक है. वर्तमान समय में व्यास परंपरा में संशोधन की आवश्यकता है.

स्रियों के सम्मान के लिए हमने युद्ध तक लड़ा है : 

सनातन परंपरा का उल्लेख करते हुए पुरी पीठाधीश्वर ने कहा कि हमारे देश में हमेशा से स्रियों का सम्मान रहा है. सीता और द्रौपदी का उदाहरण देते हुए स्वामी जी ने कहा कि हमारे देश में नारी सम्मान और उनकी रक्षा के लिए रामायण और महाभारत जैसे संग्राम भी हुए है.

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भौतिक विकास के नाम पर हमारी सनातन परंपरा को नष्ट किया जा रहा है : पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य

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भौतिक विकास के नाम पर हमारी सनातन परंपरा को नष्ट किया जा रहा है : पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य


माय टाइम्स टुडे। भोपाल । शुक्रवार को नगर के मानस भवन मेें ‘वर्तमान परिस्थिति में धर्म के प्रति हमारा कर्तव्य’ विषय पर बोलते हुए पुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी ने कहा कि आज हम भले स्वतंत्र है लेकिन सैद्धांतिक रूप से हम स्वतंत्र नहीं है. हमारे देश में न तो विकास के माध्यम अपने हैं न ही सेवा के प्रकल्प अपने हैं. हमारे सविंधान की आधारशीला हमारी नहीं है. सैद्धांतिक धरातल पर हम आज भी परतंत्र ही है.भारतीय सनातन ज्ञान परंपरा का वर्णन करते हुए स्वामी जी ने बताया कि दुनिया के ज्ञान का जहां पर अंत होता है वही से हमारा ज्ञान शुरू होता है.

आईए जानते हैं स्वामी जी के संबोधन की बड़ी बातें : 

वर्तमान समय में बद्रीनाथ, पुरी, पुष्कर आदि महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों का हम दर्शन कर पा रहे हैं तो इसके पीछे आदि शंकराचार्य का बहुत बड़ा योगदान है.

अर्थ, कर्म, मोक्ष और धर्म की प्राप्ति करना ही सृष्टि निर्माण का प्रयोजन है.

सनातन शास्र में न तो काम उपेक्षा है और न ही अर्थ की उपेक्षा है. लेकिन शास्वत होना चाहिए है.

जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु भी सुनिश्चित है.
जो पुनर्जन्म के उदेश्य से जन्म नहीं लेता है उसी का जीवन सार्थक है तथा जो पुन: मरने के लिए नहीं मरता उसी का मरना सार्थक है.

श्रीमद्भगवत गीता में तीन चक्षु का उल्लेख है : स्व चक्षु, दिव्य चक्षु और ज्ञान चक्षु. भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिव्य चक्षु के माध्यम से अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन दिया था.

मन और इंद्रियों में अंतर समझाते हुए स्वामी जी ने कहा कि मन भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों काल में गतिमान होता है जबकि इंद्रिया सिर्फ वर्तमान में क्रियाशील रहती हैं.

मन के मन पर तो हम स्वयं को धरती,आकाश, पक्षी अनेकादि स्वरूपों में देखते है पर वास्तविकता के धरातल पर पुन: शरीर रूप में ही रहते है.

हमार जन्म उत्कर्ष और अपकर्ष का द्योतक है. अगर हमें एक बार जन्म लेने के बाद पुन: जन्म नहीं लेना पड़े तो यह उत्कर्ष है और अगर हम पुन: जन्म लेते है तो यह अपकर्ष है.

हम भारतीयों को जो ईश्वर से मिला है वह अन्य को स्वपन्न में भी नहीं मिलेगा.

उनका ईश्वर जगत बनाता है लेकिन हमारा ईश्वर जगत बनता भी है और जगत बनाता भी है.

सनातन का मतलब है जो किसी समय कालखंड स्थिति परिस्थिति में नष्ट नहीं होता हो वही सनातन है.

आज भौतिक विकास के नाम पर हमारी वैदिक परंपरा को नष्ट किया जा रहा है. कुल गुरू, कुल पुरूष, कुलदेव, कुल धर्म आदि का पतन किया जा रहा है. आज विकास के नाम पर मानव जीवन की सार्थकता को अवरूध कर दिया गया है.

आज शिक्षा पद्धति को बाजारा का सौदा बना दिया गया है.

आज महायंत्रों के प्रयोग और भौतिक विकास के कारण हमारे सात तत्व गो वंश, विप्र, वेद, सती, सत्यवादी, निर्लोभी और दानशील का विलोप हो रहा है.

मनुस्मृति का एक सूत्र भी कोई समझ जाए तो उससे पूरे भारत का काया कल्प हो जाएगा.