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जन्मदिन विशेष : नेहरू का यह सच जो हमेशा छुपाया गया


माय टाइम्स टुडे। भारत में 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। बाल दिवस अर्थात् हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। पंडित नेहरू बच्चों प्रेम और स्नेह करते थे इसलिए बच्चों के बीच वे चाचा नेहरू के रूप में प्रसिद्ध थे। पंडित जवाहर नेहरु जितने प्रसिद्ध थे उनके साथ उतने ही किस्से-कहानियां जुड़े हुए है जिनमें कितनी वास्तविकता है यह प्रमाणित नहीं है। आइए जाने ऐसे ही कुछ किस्सों के बारे में –

1.) जवाहर लाल नेहरू एक प्रसिद्ध वकील मोतीलाल नेहरु के बेटे थे। जवाहर लाल नेहरू को एक अय्याश किस्म का व्यक्ति कहा जाता था। अपनी अय्याशियों में वे मंहगें-मंहगें शौक करते थे। ऐसी भी बातें भी कही जाती है कि उनके कपड़े धुलने के लिए पेरिस और लंदन जाते थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू को दोपहर के खाने के बाद 555 ब्रांड की सिगरेट पीने की आदत थी। एक जवाहर लाल नेहरू भोपाल गए और लंच करने के बाद जब सिगरेट पीने की बारी आई तो उनके पास इस ब्रांड की सिगरेट खत्म हो चुकी थी। जब भोपाल में भी यह सिगरेट नहीं मिली तो एक विमान से उन्होने यह सिगरेट इंदौर से मंगवाई। जवाहर लाल नेहरू की इसी प्रकार की आदत के कारण कई किस्से-कहानियां सुनने को मिलते है।

2.) नेहरू रसिया किस्म के व्यक्ति थे। कमला नेहरू से शादी करने से पहले उनके कई महिलाओं से संबंध जोड़े जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जवाहरलाल नेहरु के संबंध सरोजिनी नायडू की बेटी पद्मजा नायडू से भी थे जिनकी एक तस्वीर उन्होने घर में लगा रखी थी। पद्मजा के अलावा जवाहर लाल नेहरू के संबंध तेजी नामक एक लड़की से भी थे। इसके बनारस की एक सन्यासिनी के साथ नेहरू के अंतरंग संबंध थे। इसी सन्यासिनी से उन्हें एक लड़का भी हुआ जिसे बाद में उन्होंने उसे स्वीकाराने से मना कर दिया। इन सब के अलावा उनका सर्वाधिक लंबा संबंध अंतिम वाइसराय लुईस माउंटबेटन की पत्नी एडविना माउंटबेटन से रहे जो कमला नेहरू की मृत्यु के बाद भी जारी रहे। एडविना से उनके संबंध की चर्चा तो भारत से लेकर ब्रिटेन तक रही।

इन संबंधों में कितनी वास्तविकता है यह तो नहीं पता लेकिन यह कहानियां जवाहर लाल नेहरू के जीवन से जुड़ी हुई हैं।

3.) सरदार वल्लभभाई पटेल को भारत का बिस्मार्क के नाम से जाना जाता है जिन्होंने लगभग 565 रियासतों को एक करने का काम किया। वही जवाहर लाल नेहरू को कश्मीर की रियासत को भारत में मिलाने का जिम्मा सौंपा गया। इसी जिम्मेदारी को उन्होने अच्छी तरह नहीं निभाया। पाकिस्तान सेना ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और कश्मीर के उत्तर-पश्चिमी इलाके पर कब्जा कर लिया। इस इलाके को कब्जे से हटाने के लिए उन्होंने यह मामला संयुक्त राष्ट्र परिषद ले गए। जो संयुक्त राष्ट्र परिषद खुद 1945 में बनी हो उसके पास कितनी शक्तियां होगी इसका अंदाजा आप खुद ही लगा सकते है और कश्मीर मुद्दा आज भी जस का तस है।

सरदार वल्लभभाई पटेल से चोरी छिपे जवाहर लाल नेहरू ने शेख अबदुल्ला के साथ अनुच्छेद 370 बनाकर कश्मीर को एक स्वायत्त राज्य घोषित करवा दिया ।

4.) एडल्ट कंटेंट छापने वाली मैग्जीन प्लेबॉय ने एक बार जवाहर लाल नेहरू का इंटरव्यू छाप दिया। प्लेबॉय मैग्जीन भारत में उस समय बैन थी। जब भारत के रहवासियों को यह मालूम चला कि एडल्ट कंटेंट वाली प्लेबॉय मैग्जीन में जवाहर लाल नेहरू का इंटरव्यू छपा है तो यह मैग्जीन भारत में छह गुना अधिक दाम पर बिकने लगी वो भी चोरी छिपे। जब यह बात सरकार तक जा पहुंची तो प्लेबॉय से इस बारे में जानकारी मांगी गई तो प्लेबॉय के एडिटर ने कहा कि यह इंटरव्यू एक ऐसे व्यक्ति ने लिया है जो बहुत सारे लोगों का इंटरव्यू ले चुका है। बिना आग के धुंआ नहीं उठता। इस मैग्जीन के एडीशन को बैन करा दिया गया और एडिटर से माफी मंगवाकर मामले को शांत कर दिया गया। इस बात को लेकर वास्तविकता क्या है ? यह तो नहीं पता परंतु कुछ तो घालमेल था।

5.)  जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने और सरदार वल्लभभाई पटेल पहले उप प्रधानमंत्री बने। सभी की यह इच्छा थी कि सरदार वल्लभभाई पटेल प्रधानमंत्री बने परंतु जवाहर लाल नेहरू की जिद के कारण यह संभव न हो सका। जवाहर लाल नेहरू को मुख्य कार्यकारिणी मात्र 3 वोट मिले थे जबकि सरदार वल्लभभाई पटेल को इससे कही अधिक वोट मिले थे फिर गांधी जी के कहने पर उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के लिए प्रधानमंत्री का पद त्याग दिया। जवाहर लाल नेहरू ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के नेता थे वे अपने समकक्ष किसी के भी नहीं आने देना चाहते थे। उन्होंने इसी ईर्ष्या के चलते सुभाष चंद्र बोस के परिवार की 20 साल तक जासूसी करवाई थी।

डॉ भीमराव अंबेडकर से भी इनकी नहीं बनती थी क्योंकि उस जमाने में डॉ भीमराव अंबेडकर सर्वाधिक पढ़े लिखे थे। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी ज्यादा दिनों तक जवाहर लाल नेहरू की सरकार में मंत्री नहीं रहे और इस्तीफा दे दिया।

इन किस्सों से पता चलता है कि एक व्यक्ति कितने तूफान पैदा कर सकता है जबकि उसकी सतह पर पकड़ हो या न हो।

लेखक : विनय कुशवाहा

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व्यंग विशेष : आखिर नेहरू के जन्मदिन पर ही बाल दिवस क्यों


माय टाइम्स टुडे। हर वर्ष 14 नवंबर को बाल दिवस मनाया जाता है, जी मैं जानता हूं कि आपको ये बात अच्छे से पता है। लेकिन समस्या यह है कि बाल दिवस मनाया क्यों जाता है? आपका जवाब शायद यही होगा कि जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन को हम बाल दिवस के रूप में मनाते हैं। मेरी समस्या भी इसी जवाब से ही उत्पन्न होती है।
आखिर नेहरू ने बच्चों के लिए ऐसा क्या कर दिया कि उनके जन्मदिन को बच्चों को समर्पित कर दिया गया। साथ ही यह बात भी दिमाग में चूहे की तरह छेद करने लगती है कि बाल दिवस तो सन् 1925 में ही मनाना आरम्भ कर दिया गया था औऱ सन् 1935 में पूरी दुनिया नें इसे मान्यता भी दे दी थी, तो नेहरू नाम की ये बत्ती किसने जला दी।
मोतीलाल के लाल के किस्से तो जग-प्रसिद्ध हैं, आपने भी सुनें ही होगें। हां ये हो सकता है कि आप इन सब बातों पर विश्वास न करते हों पर बिना आग के धुंआ तो उठता भी नहीं साहब जी। फिर किस्से भी इतने हैं कि मन-गढ़ंत हों ऐसा प्रतीत भी नहीं होता। खैर वो बात न करके हम आते हैं मोती के लाल से भविष्य के लाल, पीले, नीले, गुलाबी यानी कि बच्चों पर, जिस पर हमें बात करनी है।
दुनिया के लगभग सभी देशों में बाल दिवस मनाया जाता है। कुछ देश 20 नवंबर को इसे मनाते हैं। शायद उन्हें नेहरू की जन्मतिथि सही पता नहीं होगी या फिर वे सभी नेहरू को महान व्यक्ति नहीं मानते होंगे। कहने को तो कुछ भी हो सकता है पर नेहरू जी ने जो बच्चों के लिए किया ये बात उन देशों को पता नहीं होगी। उम्मीद है आपको जरूर पता होगी। मुझे तो पता नहीं और न ही मेरी नानी, दादी ने ऐसी कोई कहानी ही सुनाई है, जिससे मैं यह सीना तान कर कह सकूं कि नेहरू जी ने हमारे देश औऱ दुनिया के बच्चों के लिए इतना बड़ा बलिदान दिया।
अरविंद घोष और रवीन्द्र नाथ जी का नाम तो सुना ही होगा। जी हां नोबल वाले रवीन्द्र नाथ पर अरविंद को तो एक सन्यासी के रूप में ही जानते होंगे। इन दोनों महान विभूतियों ने बच्चों की शिक्षा पद्धति पर जो काम किया है वह शायद आज तक भारत में कभी न हुआ है। कभी न होगा, यह मैं कह नही सकता क्योंकि मैं राधे मां से मेरा कोई वास्ता नही है। पर इन महान पुरुषों का दुर्भाग्य कहें या फिर नेहरू जी के पिता की अपार संपत्ति का सौभाग्य कहें कि देश के कुछ लोगों के मन में इतना स्वामी प्रेम उमड़ आया कि जन्मदिन के उपहार स्वरूप बालदिवस ही मनाने लगे। माना कि जापान में एक हाथी भेजा था दद्दू ने, पर इसका मतलब यह तो बिल्कुल ही नहीं होता कि इस घटना को पूरे बच्चों पर थोप दिया जाए।
मेरा बालदिवस मनाने का विरोध नहीं है, पर किसी को जबरन महान बना कर बेतुका मेल करके बच्चों के साथ मिला देना गलत है। श्रीमान की एकमात्र पुत्री थी। पूरे जीवन कभी भी महाशय ने अपनी एकलौती संतान के साथ उतना समय नहीं बिताया था जितना एक सामान्य पिता को अपनी संतान के साथ बिताना चाहिए। बेटी के बड़े होने पर तो स्थितियां और भी दयनीय हो गईं। पिता-पुत्री के मध्य कभी भी सामंजस्य नहीं रहा। अब आप ही बताएं कि अपने बच्चे को संभालने में जय माता की है तो दुनिया भर के बच्चों को प्यार, दुलार देने का समय कहां से मिल सकता है। उपहार इसलिए नहीं कहा क्योंकि पैसे वाले लोग थे हो सकता है कभी किसी के सेकेंड हैंड खेलौने दे दिए हों।
अब रही बात जगत चाचा के मानद उपाधि से सम्मानित होने की तो जब उम्र बड़ने लगती है तो पड़ोस की सुन्दर लड़की भी अंकल ही कह कर बुलाती है, भले ही यह सुन कर आपके दिल के हजार टुकढ़े हो रहे हों, पर सुनना पड़ता है। भगवान भी हमें कौवा से हंस बनाने में लगे होते हैं पर हम अपने बालों में खेजाब करके कौवा ही बने रहना चाहते हैं, क्योंकि हम नहीं चाहते कि कोई हमें अंकल कहे। मान भी लिया कि हमारे सफेद हंस जैसे बालों को देखकर कोई अंकल-अंकल कहता है तो इसका ये तो मतलब नही कि हम बच्चों से अपार प्रेम करते हैं, इसलिए बच्चे हमें अंकल कह रहें हैं। बल्कि हमारी उम्र ही है अंकल वाली। पर ये बात समझाए कौन क्योंकि समझने वाले भी राम रहीम के डेर वाले भक्तों जैसे हैं।
एक बात तो एक्वाप्योर वाटर की तरह है साफ कि बाललदिवस भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में भी मनाया जाता है। मुझे बिल्कुल नहीं लगता कि नेहरू जी इन देशों को कोई कर्जा दे गए थे कि भाई मेरे जन्मदिन को बाललदिवस के रूप में मनाओ। हां नेहरू को महान बनाने के लिए उनके फैन्स ने यह कारनामा कर दिया होगा कि भारत में बाल दिवस उन्हीं के जन्मदिन पर मनेगा जिसके सिर में एक भी बाल न हों। और बाजी मार ली नेहरू जी ने और हम अभी भी कूप मण्डूक बने गला फाड़कर यही कहते रहते हैं कि नेहरू जी के बालक प्रेम के कारण उनके जन्मदिन पर बाल दिवस मनाया जाता है। नेहरू जी को प्रेम तो था पर किससे इस पर कहानियों का अम्बार है, पढ़े और हमें भी सुनाएं।
हमें पढ़ने के लिए धन्यवाद, भगवान मुझे खुश रखे।

लेखक : अभिषेक सिंह