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दक्षिणपंथ- वामपंथ की राजनीति में उलझ के रह गया पत्रकारों का इंसाफ


mytimestoday.पत्रकारों पर हमलें करना उनकी हत्या करना उन्हें डराना धमकाना ऐसी खबरें अक्सर हमारे बीच आती रहती है. अक्सर पत्रकारों को सच लिखने और झूठ को बेनकाब करने पर इन तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. हमेशा से दबंग और सत्ता पक्ष के लोग चाहते है कि डरा धमका कर सच पर परदा डाल दिया जाए. कोई भी पत्रकार उनको बेनकाब न करें सके पर तमाम धमकियों के बाद भी पत्रकार लिखते है, बोलते है और मौत की परवाह किए बिना अपने कलम के दम पर सत्ता और दबंगों की सियासत को हिला कर रख देते है. यह भी उतना ही सच है कि अनेक पत्रकारों को चाहे वो बिहार के राजदेव रंजन हो या यूपी के जगेंद्र सिंह या फिर एमपी के कमलेश जैन इन सबकों सच लिखने, सच बोलने पर अपनी जान गंवानी पड़ी. यह कोई नयी बात नहीं है, पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर मांग उठनी चाहिए, पत्रकारों की सुरक्षा प्राथमिक सुरक्षा होनी चाहिए.अभिव्यक्ति की आवाज बुलंद करने वालों को, आमलोगों की बातों को उठाने वालों को अगर गोलियों का शिकार होना पड़े तो यह लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्य ही है. ऐसे कृत्यों की जितनी निंदा की जाए कम है. पर पत्रकारों की हो रही निर्मम हत्या जब साजिशन राजनीति के रुप में मोल भाव होने लगे तो यह सही नहीं है. अभी हाली ही में केरल की पत्रकार गौरी लंकेश और त्रिपुरा के पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या कर दी गयी. इनकी हत्या पर पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर मांग कम रानीतिकरण ज्यादा हो गया. किसी ने भाजपा को कोसा किसी ने कांग्रेस को कोसा तो किसी ने दक्षिणपंथ और वामपंथ को लपेट दिया. इस प्रकार की परंपरा नई जरूर है पर न तो यह सामाज के लिए हितकर है न ही पत्रकारों के लिए. आपको याद होगा कि गौरी लंकेश की हत्या के बाद देशभर में प्रद्रर्शन हुए, केरल सरकार की बजाए संघ और बीजेपी पर जमकर हमला बोला गया. प्रेस क्लब से लेकर सड़क चौराहों हर जगह सरकार के खिलाफ नारे लगाये गए. चूंकि गौरी लंकेश दक्षिणपंथ विरोधी थी इसलिए उनकी हत्या को वामपंथी पक्ष ने राजनीतिक रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वहीं त्रिपुरा में एक टीवी पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या कर दी गयी.यह हत्या किसी तरह से गौरी लंकेश से कम नहीं था पर चूंकि वहा वामपंथ की मानिक सरकार है तो इस हत्या को उतनी महत्ता नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी. कुछ लोगों ने शांतनु के लिए जरूर आवाज उठाई पर गौरी लंकेश की तुलना में इतना काफी नहीं था. दरअसल प्रश्न यह है कि पत्रकारों की हत्या को राजनीतिक चश्में से देखना सही है? क्या पत्रकारों की हत्या पर एक जुट होकर आवाज बुलंद करने की बजाए दक्षिणपंथ – वामपंथ पर आरोप प्रत्यारोप लगाना सही है? क्या इस तरह के दोहरापन से पत्रकारों को न्याय मिलेगा ? ऐसे प्रश्न विचारणीय है, सोशल मीडिया से लेकर तमाम जगहों पर पत्रकारों के हक के लिए लड़ने वालों को मंथन करने की आवश्यकता है. उन्हें यह जरूर सोचना होगा कि सामाजिक हितों के लिए दिन रात लगे रहने वालों को पूरा सामाज एककृत होकर न्याय दिलाएगा, उनके साथ खड़ा रहेगा या राजनीतिक पेंच में फंसकर इनकी कलम दम घूंट देगी…

लेखक : इंद्रभूषण मिश्र।

संपादक mytimestoday.com

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गौरी लंकेश हत्याकांड : जवाब माँगते कुछ सवाल


MY TIMES TODAY. लोकतंत्र और सभ्य समाज में हत्या के लिए किंचित भी स्थान नहीं है। किसी भी व्यक्ति की हत्या मानवता के लिए कलंक है। चाहे वह सामान्य व्यक्ति हो या फिर लेखक, पत्रकार और राजनीतिक दल का कार्यकर्ता। हत्या और हत्यारों का विरोध ही किया जाना चाहिए। लोकतंत्र किसी भी प्रकार तानाशाही या साम्यवादी शासन व्यवस्था नहीं है, जहाँ विरोधी को खोज-खोज कर खत्म किया जाए। लोकतंत्र में वामपंथी कार्यकर्ता गौरी लंकेश की हत्या का विरोध ही किया जा सकता है, समर्थन नहीं। किंतु, जिस तरह से लंकेश की हत्या के तुरंत बाद पूरे देश में एक सुर से भाजपा, आरएसएस और हिंदुत्व को हत्यारा ठहराया गया, क्या यह उचित है? यह पत्रकारिता का धर्म तो कतई नहीं है। अनुमान के आधार पर निर्णय सुनाना कहाँ जायज है? पत्रकारों को तथ्यों के प्रकाश में अपने सवाल उछालने चाहिए। पत्रकारों का यह काम नहीं है कि न्यायाधीश बन कर या बिना जाँच-पड़ताल तत्काल किसी मामले में निर्णय सुना दें। आखिर किस आधार पर पत्रकारों ने एक सुर में भाजपा और आरएसएस को लंकेश की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया और देश में राष्ट्रीय विचारधारा के प्रति घृणा का वातावरण बनाने का प्रयास किया? क्या सिर्फ इसलिए कि वह कम्युनिस्टों की घोर समर्थक थीं और स्वयं को कॉमरेड कहती थीं? क्या सिर्फ इसलिए कि गौरी लंकेश अपने फेसबुक-ट्वीटर अकांउट और अपनी पत्रिका ‘लंकेश पत्रिके’ में ज्यादातर भाजपा, आरएसएस एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लिखती थीं?
गौरी लंकेश के इस प्रकार लिखने के आधार पर यदि आप मान कर बैठ गए हैं कि उनकी हत्या राष्ट्रीय विचारधारा ने की है, तब आप निपट नासमझ हैं। क्योंकि, ऐसा लिखने-बोलने वाले और भी बहुत लोग हैं, जिनकी लोकप्रियता एवं प्रभाव लंकेश से कहीं अधिक है। एक बात और, मानहानि प्रकरण में लंकेश का दोष सिद्ध होने पर भाजपा तो लोकतंत्र में नैतिक लड़ाई जीत ही गई थी। माननीय न्यायालय ने लंकेश को तथ्यहीन और मानहानिकारक लिखने का दोषी पाते हुए छह माह कारावास की सजा सुनाई थी। वह जमानत पर जेल से बाहर चल रही थीं। भाजपा और आरएसएस के लोग तो लंकेश के कहे-लिखे के बरक्स न्यायालय में मिली अपनी विजय को रख कर उन्हें बार-बार कठघरे में खड़ा कर सकते थे। यदि किसी के पास अपने विरोधी को हर बार झूठा सिद्ध करने का हथियार हो, तब भला वह क्यों बंदूक का इस्तेमाल करेगा? इसलिए हमें अपनी आँखों पर पड़े पर्दे को हटा कर लंकेश की हत्या के दूसरे एंगल भी देखने चाहिए। उन्हें न्याय दिलाना है, उनके कातिलों को पकड़वाना है और उनकी हत्या के वास्तविक कारणों का खुलासा करना है, तब अन्य पहलुओं की पड़ताल करनी ही चाहिए। यदि ‘हत्या पर सियासत’ ही करनी है, तब किसी कुछ और सोचने की जरूरत नहीं।
गौरी लंकेश को धमकी सिर्फ कथित भगवा बिग्रेड से ही नहीं मिलीं थी, उन्हें नक्सलियों की ओर से भी धमकियां आ रही थीं। खबरों के मुताबिक लंकेश कांग्रेसनीत कर्नाटक सरकार के किसी मंत्री के घोटाले को उजागर करने की भी तैयारी कर रही थीं। इन सब बातों की अनदेखी कर कथित पत्रकारों ने एक ही पक्ष पर लक्षित हमला क्यों बोला? समाज में विमर्श इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द चल रहा है। आप जिधर ले जाना चाहते थे, आम आदमी उधर नहीं गया। क्योंकि, उसे आपके विरोध में स्वाभाविक पीड़ा कम, सियासत अधिक दिखाई दे रही थी।
कॉमरेड गौरी लंकेश की हत्या के बाद राजनीतिक रंग ले चुके विरोध प्रदर्शन और बहस के बीच बहुत से जरूरी सवाल आम समाज से लेकर बौद्धिक जगत में जवाब माँग रहे हैं। यह सवाल ऐसे नहीं है, जिन्हें यह कह कर खारिज किया जाए कि इनका औचित्य क्या है? लंकेश के समर्थन में प्रारंभ हुई मुहिम को कमजोर करने के लिए पूछे जा रहे हैं यह सवाल, ऐसा कह कर भी उन्हें टाला नहीं जा सकता। आखिर, सवालों से कोई मुहिम कमजोर कैसे और कब हो सकती है? सवाल ही तो हैं, जो मुहिम की बुनियाद में होते हैं। सवाल ही तो होते हैं, जिनके जवाब खोजने के लिए लोग आवाज बुलंद करते हैं। इसलिए सवालों की उपेक्षा किसी भी सूरत में नहीं करनी चाहिए। अब सवाल देखिए और उनके जवाब खुद ही तलाशिए, क्योंकि लंकेश की हत्या पर सियासत कर रहे लोग इन सवालों के जवाब नहीं देंगे।
1. जब गौरी लंकेश का भाई इंद्रजीत ही टाइम्स ऑफ इंडिया और एनडीटी सहित अन्य मीडिया संस्थानों से बातचीत में बार-बार कह रहा है कि पिछले कुछ दिनों में नक्सलियों से गौरी को धमकी भरे पत्र मिले थे। चूँकि गौरी नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने की मुहिम की अगुवाई कर रही थीं, कुछ नक्सलियों को मुख्यधारा से जोडऩे में वह सफल भी हुई थीं, जिसकी वजह से वह नक्सलियों के निशाने पर थीं और उन्हें लगातार धमकी भरी चिट्ठी और ईमेल आते थे। उनके भाई की चिंता सही भी है। हम जानते हैं कि जासूसी और गद्दारी के शक मात्र में नक्सली संदेही के पूरे परिवार तक को जिंदा जला देते हैं। गौरी के आखिरी ट्वीट भी इशारा कर रहे हैं कि कॉमरेडों के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था। फिर क्यों, पत्रकारों ने गौरी की हत्या का आरोपी नक्सलियों को नहीं बनाया?
2. गौरी लंकेश पहली पत्रकार नहीं है, जिनकी हत्या की गई है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1992 से 2017 के बीच 40 पत्रकारों की हत्या की गई है। 39 पत्रकारों की हत्या पर इतना आक्रोश प्रकट क्यों नहीं हुआ? क्या लंकेश की हत्या का इंतजार किया जा रहा था? या फिर पहले मरने वाले पत्रकार हिंदी और अन्य भारतीय भाषा के पत्रकार थे। या फिर यह महानगरों में पत्रकारिता नहीं करते थे, बल्कि क्षेत्रीय स्तर के पत्रकार थे। या फिर इसलिए कि इनके वैचारिक पक्ष की जानकारी पत्रकारों को नहीं हो सकी थी?
3. गौरी लंकेश की हत्या कर्नाटक के प्रमुख शहर बेंगलूरू में हुई। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है और सिद्धारमैया मुख्यमंत्री हैं। जिस तरह खुलेआम लंकेश की हत्या हुई, उसके लिए कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से सवाल क्यों नहीं पूछे जा रहे? लचर कानून व्यवस्था के लिए राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा करने की जगह केंद्र सरकार पर हमला क्यों बोला जा रहा है? क्या सिर्फ इसलिए कि कर्नाटक सरकार पर हमला बोलने से वैचारिक स्वार्थ पूर्ति नहीं हो पाएगी? हत्या का विरोध असल मकसद नहीं है, बल्कि सियासत करन पहला उद्देश्य है।
4. गौरी लंकेश की हत्या को कलबुर्गी से जोडऩे के लिए एक जैसे हथियार की थ्योरी खोजकर लाने वालों ने कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से यह पूछने की जहमत क्यों नहीं उठाई कि कलबुर्गी के हत्यारों का क्या हुआ? दो साल से अधिक समय कांग्रेस सरकार को हो गया, इसके बाद भी कलबुर्गी के मामले का पटाक्षेप नहीं हो पाया। अब तक हत्यारे खुले क्यों घूम रहे हैं?
5. पत्रकार, कम्युनिस्ट लेखक-विचारक एवं अन्य राजनीतिक दलों ने बहुत जल्दी में निर्णय क्या इसलिए सुना दिया ताकि वास्तविक तथ्यों/प्रश्नों पर पर्दा डाला जा सके? क्या यह कोई नेटवर्क है, जो किसी खास प्रकार की घटनाओं पर अत्यधिक तेजी से सक्रिय होता है, जबकि केरल में असहमति और वैचारिक भिन्नता के आधार पर लगातार हो रहीं हत्याओं पर पर्दा डालने का प्रयास करता है?
6. गौरी लंकेश की हत्या के विरोध में प्रेस क्लब में पत्रकारों द्वारा आहूत प्रदर्शन क्या वास्तव में पत्रकारों का आयोजन था? यदि यह पत्रकारों का आयोजन था, तब मंच पर धर्मांतरण में संलिप्त ईसाई संस्था, कम्युनिस्ट और कांग्रेस नेता क्या कर रहे थे? भाजपा के नेताओं को क्यों नहीं बुलाया गया? जबकि भाजपा के नेताओं ने भी लंकेश की हत्या की निंदा की है और कर्नाटक सरकार से माँग की है कि जल्द से जल्द हत्यारे पकड़े जाने चाहिए।
7. गौरी लंकेश की हत्या के विरोध में दिल्ली प्रेस क्लब में जब सभा चल रही थी, तभी जेएनयू की छात्रनेता ने ‘द पब्लिक’ टीवी चैनल के पत्रकार के साथ न केवल बदतमीजी की, बल्कि उन्हें वहाँ से भगा दिया। अभिव्यक्ति की आजादी, सहिष्णुता और पत्रकारिता की रक्षा के स्वयंभू ठेकेदारों की उपस्थिति में यह सब होता रहा, लेकिन किसी ने प्रतिरोध नहीं किया। तब भी नहीं किया और अभी भी नहीं कर रहे। पत्रकारों के लिए ही चिह्नित स्थान पर एक छात्रनेता पत्रकार को ही घुसने से रोक देती है और हमारे स्वनामधन्य पत्रकार देखते रहते हैं? वहाँ पत्रकारिता के हितों की बात हो रही थी या एक विचारधारा की पैरवी?
8. एक ‘अनधिकृत व्यक्ति’ की टिप्पणी के आधार पर हमने एक पूरी विचारधारा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कठघरे में खड़ा कर दिया। लेकिन, अब हम ‘अधिकृत व्यक्तियों’ की गाली-गलौज की भाषा को उनका व्यक्तिगत विचार मान रहे हैं। यह दोहरा आचरण क्या हमारी निष्पक्षता और नैतिकता को उजागर नहीं करता है? हम दधीची नाम के व्यक्ति द्वारा उपयोग किए गए असभ्य शब्द को लेकर दुनिया भर में घूम रहें, लेकिन क्या हमें गौरी लंकेश के द्वारा उपयोग किए गए शब्दों, विश्लेषणों और चित्रों को भी जनता के सामने नहीं रखना चाहिए? वह जिस प्रकार संघियों की पैदाइश और उनकी को परिभाषित एवं श्रेणीकरण कर रही थीं, क्या गौरी का तरीका और संवाद का स्तर उचित था? क्या वह प्रगतिशील भाषा का संस्कार था?
9. गौरी लंकेश हत्याकांड पर हमने जिस प्रकार की रिपोर्टिंग की है। उसे देखकर क्या हमें पुन: विचार नहीं करना चाहिए कि हम पत्रकारिता कर रहे हैं या विचारधाराओं के समर्थक एवं विरोध बन कर पक्षधरिता कर रहे हैं? रिपोर्टिंग का पहला सिद्धाँत है, निष्पक्षता। हमें अपनी रिपोर्ट में कुछ भी लिखने-बताने से पहले गहराई से पड़ताल नहीं करनी चाहिए थी? तथ्यों को कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए था?
10. गौरी लंकेश की लिखने-पढऩे को पत्रकारिता की श्रेणी में रखा जाना चाहिए या नहीं? क्या पत्रकारिता को पुन: परिभाषित करने का समय आ गया है? क्योंकि, यह तो लगभग सभी मान रहे हैं कि वह भाजपा और आरएसएस की न केवल कट्टर विरोधी थीं, बल्कि वैसा ही लेखन भी करती थीं। ‘गोदी मीडिया’ को परिभाषित करने वाले लोग इस प्रकार की पत्रकारिता को क्या नाम देंगे? क्योंकि यह भी सहज पत्रकारिता तो नहीं है।
बहरहाल, प्रश्न भले ही वाजिब हों लेकिन किसी की हत्या को संदेह के घेरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। प्रत्येक सूरत में हत्या का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए। भले ही वह आपका घोर विरोधी रहा हो, आपके लिए अमर्यादित भाषा-शैली का उपयोग करता रहा हो। गौरी लंकेश के सोशल मीडिया प्रोफाइल के मुताबिक भले ही उन्होंने केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की हत्या पर ‘स्वच्छ केरल’ का संदेश प्रसारित किया हो, लेकिन इस आधार पर किसी ओर को ‘स्वच्छ कर्नाटक’ हैसटैग चलाने का अधिकार नहीं मिल जाता है। बस्तर में नक्सलियों के हाथों 76 जवानों की हत्या पर ‘पार्टी’ का आयोजन करने वाले उचित ही कह रहे हैं कि गौरी लंकेश की हत्या पर खुशी जाहिर कर रहे लोग बेशर्म हैं। निश्चित तौर पर यह स्वस्थ परंपरा नहीं है। बहरहाल, गौरी लंकेश की हत्या के बाद कर्नाटक ही नहीं, अपितु पूरे देश में जिस प्रकार का राजनीतिक वातावरण बनाया गया है, उसने एक बार फिर देश में बनावटी असहिष्णुता का माहौल बना दिया है। हालाँकि, इस माहौल में एक बार फिर कम्युनिस्ट नेटवर्क का खुलासा हो रहा है।

लेखक : लोकेंद्र सिंह 

जाने माने पत्रकार, लेखक, वर्तमान में माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में बतौर सहायक प्राध्यापक कार्यरत है।