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राहुल जी मंदिर जाए या मस्जिद : गुजरात को उसका ‘बेटा’ पसंद है


माय टाइम्स टुडे। गुजरात चुनाव के परिणाम घोषित हो गए है. एक बार फिर से बीजेपी को गुजरात विधान सभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिला है. लगातार 22 सालों से चली आ रही बीजेपी शासन पर गुजरात ने एक बार फिर से तमाम अटकलों को नकारते हुए अगले पांच सालों के लिए सत्ता की चाभी बीजेपी को सौपं दी है. 2014 में मोदी के गुजरात छोड़कर देश की बागडोर संभालने के बाद ऐसा लगा कि गुजरात में धीरे – धीरे मोदी मैजिक फीका पड़ जाएगा.कुछ हद तक यह सही साबित भी हुआ.मोदी के पीएम बनने के 3 साल के भीतर गुजरात में दो दो मुख्यमंत्री बने. गुजरात निकाय चुनाव में भी बीजेपी बहुत अच्छी स्थिति में नही रही. नोट बंदी और जीएसटी से गुजरात का एक बहुत बड़ा वर्ग बीजेपी नाखुश था.वही बीजेपी विरोध में हार्दिक पटेल के साथ आरक्षण समर्थित पटेलों का आक्रोश भी था. पिछले 22 सालों में पहली बार राहुल गांधी और कांग्रेस को तमाम मीडिया प्लेटफार्म्स पर सुर्खियां मिली. मोदी विरोध में तो सोशल मीडिया पर विकास पागल हो गया है ट्रोल करने लगा. गुजरात के हर वर्ग से कहीं न कहीं चाहे वह किसान हो व्यापारी हो या युवा हो सबने भाजपा के खिलाफ नाराजगी जाहिर की.यहां तक की गुजरात चुनाव को लेकर करीब दो हफ़्ते पहले जो ओपिनियन पोल जारी किया गया था, उसमें भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर का अनुमान ज़ाहिर किया गया था.इतना ही नहीं पहले चरण की वोटिंग में भी कांग्रेस जबरदस्त स्थिति में दिख रही थी.लेकिन एक बात अब सबके मन में उठ रही है कि अगर गुजरात के लोगों को वर्तमान सरकार से इतनी नाराजगी थी तो अाज पुन: सत्ता की बागडोर उन्होंने फिर से भाजपा को क्यों सौंप दी.आखिर 22 सालों से सत्ता वापसी की तैयारी कर रही कांग्रेस को तमाम हथकंडे अपनाने के बाद भी निराशा ही हाथ लगी. कांग्रेस को जिताने के लिए राहुल गांधी ने क्या क्या नहीं किया. पार्टी की पुरानी परंपरा से अलग होकर राहुल गांधी ने सॉफ्ट हिंदुत्व को टारगेट किया.गुजरात के एक एक मंदिर की चौखट पर माथा टेका.इतना ही नहीं जब बात राहुल गांधी के जाति और धर्म पर आ पड़ी तो राहुल गांधी की जनेऊ वाली तस्वीर जारी कर उन्हें जनेऊधारी हिंदू बताया गया. यही नहीं कांग्रेस ने राहुल गांधी को गुजरात चुनाव का हिरो बनाकर 2019 के लिए गाजे बाजे के साथ कांग्रेस अध्यक्ष का ताज़ भी पहना दिया.लेकिन जब परिणाम आये तो सब ख्वाब धूमिल हो गए.न राहुल की मंदिर की सियासत काम आई न हार्दिक तिकड़ी की आरक्षण की वकालत. पहले चरण में बीजेपी को कड़ी टक्कर देने वाली कांग्रेस दूसरे चरण में मणिशंकर के नीच वाले बयान पर हिट विकेट हो गई.दूसरे चरण में कांग्रेस भाजपा की तुलना में आधी सीटों पर सिमट गयी. दरअसल मणिशंकर का नीच वाला बयान ही कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हुआ.उस बयान को मोदी ने जिस तरह से जनता के बीच पेश किया उससे वह बात मोदी तक सीमित न होकर गुजरात के आन बान शान की हो गयी. वैसे भी गुजराती भावनात्मक रूप से बड़े मजबूत होते है इसलिए गुजरात के बेटे की आन पर की गयी चोट को कैसे सहन कर सकते है.गुजरात चुनाव परिणाम ने यह साफ कर दिया है कि मौके जिसके भी रहे हो, सियासत और सियासी मुद्दें जो भी रहे हो, सच तो यही है कि गुजरात को उसका बेटा पसंद है.

इंद्रभूषण मिश्र।

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गुजरात चुनाव : किस पर किसका पलड़ा भारी


माय टाइम्स टुडे। गुजरात चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगरमी जोरों पर है. सत्ताधारी बीजेपी और मुख्य विपक्षी कांग्रेस दोनों ही पार्टियां जनमत को अपने पक्ष में करने की पुरजोर कोशिश कर रही है. इस चुनाव में एक तरफ पीएम मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है तो वही दुसरी तरफ कांग्रेस के युवराज के भविष्य को लेकर भी अटकलें तेज हो गयी है.

यह सच है कि लगातार 22 सालों से सत्ता में रही बीजेपी पीएम मोदी के गृह क्षेत्र होने से थोड़ी मजबुत जरूर है पर हाल के दिनों में जिस तरह से राहुल गांधी को लोकप्रियता मिल रही है उसको देखते हुए कांग्रेस को नकारा नहीं जा सकता है. नोटबंदी, जीएसटी और पार्टीदार आंदोलन ने बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी है.शायद यही वजह है कि पीएम मोदी गुजरात चुनाव को लेकर चिंतित भी नजर आ रहे है.

आईए जरा समझने की कोशिश करें कि कौन कौन से वो कारक हैं जो इस चुनाव के लिए महत्वपूर्ण है और किस पर किसकी कितनी पकड़ है..

विकास : विकास का मुद्दा शुरू से गुजरात चुनाव में हावी रहा है और इसका भरपुर फायदा बीजेपी ने उठाया है.मोदी के विकास मॉडल के बल पर ही लोकसभा के चुनाव में बीजेपी बहुमत हासिल करने में कामयाब रही थी.

लेकिन नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी ने इस चुनाव में विकास मॉडल के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है. जिस तरह से सोशल मीडिया पर विकास पागल हो गया को ट्रोल किया गया, उससे बीजेपी विकास मॉडल को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है. इस बार के चुनाव में पहली बार विकास ने नाम पर कांग्रेस पार्टी राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है. केंद्र की मोदी सरकार का अच्छे दिन और तमाम लुभावने वादों पर खरा नहीं उतरना भी कांग्रेस के लिए लाभ का सौदा हो सकता है. अब यह देखना दिलचस्प होगा की मोदी के पुराने विकास मॉडल को जनता कितना पसंद करती है.

जातिगत समीकरण : गुजरात चुनाव में जाति शुरू से हावी तो नहीं रहा है पर इस चुनाव में जाति असर करती दिख रही है. पार्टीदार आंदोलन के बाद इस चुनाव में कास्ट कार्ड दोनों ही पार्टियां खेल रही है.आज गुजरात में 50 फीसदी कुल वोट ओबीसी के हैं. 14-15 फीसदी आदिवासी, 8 फीसदी दलित, 12 फीसदी पटेल, 8 फीसदी मुसलमान और 4 फीसदी अन्य वोट हैं.

इस बार युवा ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर के कांग्रेस में शामिल होने से ओबीसी वोट का कुछ हिस्सा कांग्रेस के पक्ष में जा सकता है. वही दूसरी तरफ मोदी भी ओबीसी कटेगरी से आते है तो अब यह देखना होगा कि कौन कितना वोट शेयर कर पाता है. 1985 में ओबीसी समुदाय ने कांग्रेस का साथ दिया था तो उसे 100 से अधिक सीटें मिली थीं.

इस चुनाव में भी ओबीसी वोट बहुत हद तक सरकार बनाने में भुमिका निभायेगा. पार्टीदार नेता हार्दिक पटेल भी पटेलों के कुछ वोट जरूर काटेंगे. हालांकि पटेलों का पूरा समर्थन हार्दिक पटेल को नहीं मिलता दिख रहा है.

साप्रदायिकता : चुनावों में घर्म और सम्प्रदाय हमेशा से हावी रहे है. गुजरात चुनाव में 2002 में इसका सीधा सीधा असर देखने को मिला था.लेकिन इस चुनाव में अभी तक सांप्रदायिकता हावी होती नहीं दिख रही है. हालांकि चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद यह कयास लगाए जा रहे है कि शायद इस चुनाव को भी सांप्रदायिक रंग दिया जाए.

आईकॉन फेस : गुजरात चुनाव में बीजेपी के लिए नरेंद्र मोदी चुनावी चेहरा है. दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए राहुल गांधी नायक के रूप में शामने आये है. व्यक्तिगत तौर पर बीजेपी गुजरात चुनाव को लेकर मोदी पर बहुत हद तक आश्रित है. मोदी भी पूरी कोशिश कर रहे है कि वह गुजरात चुनाव बहुमत से जीतें क्योंकि यह उनका गृह राज्य है.

अगर बीजेपी हारती है तो मोदी को आनेवाले लोकसभा चुनाव में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. अगर मोदी और राहुल के व्यक्तित्व की बात की जाए तो मोदी निश्चित ही राहुल गांधी से ऊपर है. लेकिन कुछ दिनों से राहुल गांधी को मिल रही लोकप्रियता को भी नकारा नहीं जा सकता है. शायद यही वजह है कि मोदी लगातार गुजरात दौरे पर डेरा डाले हुए है. विशेषज्ञों की माने तो संभव है कि मोदी राहुल गांधी और पार्टीदार आंदोलन को दबाने के लिए गुजरात के लोगों से भावनात्मक अपील कर सकते है.