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कविता – न तुझको पता न मुझको पता

एमटीटी नेटवर्क। 

मैं जब भी देखता हूं,
तुझको ही देखता हूं,
क्यों देखता हूं,
ना तुझको पता न मुझको पता…
जब भी सोचता हूं,
तुझको ही सोचता हूं,
क्या ख़्याल है क्या हाल है
न तुझको पता न मुझको पता….
धूप है कि छांव है,
ना गति है न ठहराव है,
जहां तुम हो वहां मैं हूं
कैसे कहें किससे कहें
न तुझको पता न मुझको पता….#Mr.IBM

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तेरा होकर भी तुझमे मौन हूं मैं…


MY TIMES TODAY. mytimestoday.com

किसी ने पूछा मेरे कौन हो तुम,
मेरा जबाब कुछ यूं था,
दिल से देखो तो आपके आईने की सूरत हूं,
महसुस करो तो रुह से रुह तक की जरुरत हूं,
प्यास लगे तो मुझे पी लेना,
धड़कने गर थमे तो मेरी सांसों मे जी लेना,
नींद गर ना आए तो मेरी आंखों मे सो जाना,
कुछ ख्वाब गर जो अधुरे रह गए तो मेरे ख्वाबों को ले जाना,
जीते जी कुछ काम आ सकू तो अपना लेना,
गर फिर भी जो कुछ अधुरा रह गया तो फिर से बुला लेना,
फिर मत पूछना कौन हूं मैैं,
बस इतना समझ लो कि, तेरा होकर भी तुझमे मौन हूं मैं।।

कुमार इंद्रभूषण।।