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लिखना तो बहुत कुछ है, पर डर है तेरे मेरे दरमियां क्या है – किसी को खबर न लग जाए….

कई दिनों से सोच रहा था कि अपनी प्रेयसी के लिए कुछ लिखूं। अक्सर उसकी शिकायत रहती है कि तुम दुनिया भर के तमाम विषयों पर लिखते हो पर कभी उसके विषय में नहीं लिखता। वैसे भी वक्त की कसौटी पर खरा तो उतरता नहीं, लोग तो सात दिन में सात किरदार निभा लेते हैं। मैं तो फूल टाइमर होने के बाद भी पार्ट टाइमर तक का भी किरदार नहीं निभा पा रहा हूं। एक एक करके सातों दिन गुजर गए, लेकिन उसे उन लम्हों का एहसास नहीं करा सका जिसके लिए वह पिछले एक साल से दिन गिन रही थी। हम तो खामखा नेताओं के घोषणा पत्र को लेकर बरसते रहते हैं ,अपने वादे भी भला जुमलों से कम कहां हैं।

कवि: इसी काल खंड में जमाने का दस्तूर बदलूंगा

यहीसोचते – सोचते दबे पांव ऑफिस जा रहा था। ऑफिस पहुंचा तो वहीं हर दिन की तरह न्यूज़ रूम का खबरों को लेकर भागम भाग वाला महौल था। हर कोई अपने काम में मगन था। मैं भी जाकर अपने चेयर पर बैठ गया। तन से तो ऑफिस में था पर मन अभी भी उसके धुन में मगन था। कुछ देर बाद कंप्यूटर ऑन किया और इधर – उधर सारी साइट्स पर नजर दौड़ाने लगा। धीरे धीरे प्रेयसी की यादों में खोया मन खबरों की उलझनों में फंसता गया। शाम तक तो बस खबर ही खबर थी, प्रेयसी की प्यास पर ऑफिस की चाय भारी पड़ रही थी। एक तरफ पक्ष – विपक्ष की तनातनी चल रही थी तो दूसरी तरफ इस्तीफों और तबादलों की ब्रेकिंग पर ब्रेकिंग। आंखे टीवी स्क्रीन से चिपकी हुई और हाथ की उंगलियां की- बोर्ड पर दे दनादन रफ्तार पकड़ रही थी। उधर प्रेयसी जी मैसेज पर मैसेज किए जा रही थी। पर मैं तो दूसरी दुनिया में ही मस्त था। मुझे खबरों की आन बान शान ने ऐसे जकड़ा था कि चाहकर भी आजाद नहीं हो सकता था।

तेरी सांसों को मेरी सांसों की उमर लग जाए

खैर देर शाम खबरों की रफ्तार थोड़ी कम हुई, की- बोर्ड की खट-खट भी धीरे धीरे कम हो गई। तभी अचानक नजर गई एक पोस्ट पर ‘ इस वैलेंटाइन डे को अपने प्रेमिका के लिए बनाएं स्पेशल’ । इतना देखते ही फिर से उनकी याद आन पड़ी। मोबाइल देखा तो ऊपर से नीचे तक उसी के मैसेज पड़े हैं। इश्क से लेकर इजहार तक, प्यार से लेकर तकरार तक के मैसेज थे। मैंने भी शोना बाबू को लगे हाथ दो चार मैसेज कर दिए। मुझे लगा शायद वो मान जाए, खुश हो जाए पर मैडम तो तमतमा गई। तभी तय किया कि आज की अंधेरी रात में सब सोएंगे पर मैं लिखूंगा।

इरादा तो कर के आया था कि एक ही लेख में सभी शिकायतें दूर कर दूंगा पर बस लिखने से मन की कसक कहां मिटती है। लाख कोशिश के बाद भी वो शब्द नहीं लिख पा रहा जो तुम्हारे तनहाई को थोड़ा कम कर सके, जो तुम से तुम तक मेरी मौजूदगी दर्ज करा सके, जो तेरी करवटों को रोक सके। वह शब्द मैं कहां से लाऊं जो तेरे लबों पर हंसी ला सके और इस अंधेरी रात में भी मेरी चांदनी खिलखिला उठे। शायद तुम भी जगी हो, करवटें बदल रही हो। तभी तो उन एहसासों में बंधा मैं थका होने के बाद भी नींद से कोसों दूर हूं।

तेरा होकर भी तुझमे मौन हूं मैं…

खैर अब रात ढल रही है, कल सुबह होगी तो फिर से भागम – भाग की दुनिया मेरा चैन- वैन लूट लेगी। फिर से तुम्हारे इंतजार को इकरार नसीब नहीं होगा। अभी रात को गुजरने में कुछ वक्त बचा है, तबतक तेरी यादों को समेट लूं, जी भर के तुझे देख लूं। वैसे भी दिन के उजाले में कहां चांद नजर आता है। और कितना लिखूं, काश तुम मेरे साइट का एक सेक्शन होती तो कसम से इन नेताओं के मायावी मोह से भंग होकर तुम्हारे लिए कुछ तो लिखता। पर डर है कि तेरे मेरे दरमियां क्या चल रहा है, इसकी खबर जमाने को न लग जाए। चलो मस्त रहो, स्वस्थ रहो, अगली बार पूरा बजट पत्रकार महोदय तुम पर न्यौछावर कर देंगे। बस जुमलों से बच के रहना।
इंद्रभूषण मिश्र।।

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