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नई दिल्ली : लीवर हीमैंजियोमा कैंसर रहित गांठ होता है। षुरुआती अवस्था में इसके कोई लक्षण प्रकट नहीं होते हैं लेकिन कुछ समय बाद यह कई तरह की समस्याएं पैदा कर सकता है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति की बदौलत, लीवर हीमैंजियोमा का न सिर्फ सर्जरी से इलाज किया जा सकता है, बल्कि इलाज के बाद रोगी गुणवत्ता पूर्ण जीवन भी जी सकता है।

मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, शालीमार बाग, नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं हेपाटोलॉजी के निदेषक डॉ. राजेश उपाध्याय ने कहा, ‘‘आम तौर पर लीवर हीमैंजियोमा लीवर में रक्त वाहिकाओं में कैंसर रहित (बिनाइन) गांठ होता है जिसमें अक्सर दर्द नहीं होता है और इससे कोई नुकसान नहीं होता है। लेकिन अगर इसका इलाज नहीं कराया जाये, तो इन गांठों का आकार बढ़ने लगता है और दर्द और परेशानी होने लगती है और साथ ही अन्य लक्षण भी प्रकट होने लगते हैं। भले ही ये गांठ कैंसर रहित होते हैं, लेकिन उनमें से कुछ त्वचा पर और कुछ लीवर के अंदर होते हैं जिनकी संख्या कई हो सकती है।’’

लीवर हीमैंजियोमा के लक्षण कुछ समय के बाद प्रकट हो सकते हैं, क्योंकि आम तौर पर लोगों में छोटे आकार का और एक लीवर हीमैंजियोमा होता है। ज्यादातर मामलों में, बड़ा हीमैंजियोमा फट सकता है, लीवर की कार्य क्षमता को प्रभावित कर सकता है और पेट में रक्तस्राव शुरू कर सकता है, या व्यापक रूप से रक्त के थक्के बना सकता है और यह हार्ट फेल्योर भी पैदा कर सकता है। हालांकि, कुछ लोगों के लीवर में कई हीमैंजियोमा हो सकते हैं। यदि हीमैंजियोमा का आकार व्यास में 4 सेमी से बड़ा है, तो तत्काल सर्जरी की सलाह दी जाती है।

उन्होंने कहा, ‘‘यदि ट्यूमर का आकार छोटा है और इसके कारण कोई असुविधा नहीं हो रही है, तो इसका इलाज कराना जरूरी नहीं है। लेकिन अगर आपको दर्द या अन्य लक्षण षुरू हो गए हों तो हालत में सुधार करने के लिए इलाज की आवश्यकता हो सकती है। ज्यादातर मामलों में, ट्यूमर को हटाने के लिए सर्जरी की आवश्यकता होती है। यदि हीपैटिक हीमैंजियोमा का सर्जरी से आसानी से इलाज हो सकता है तो डॉक्टर लीवर के ऊतकों को कम नुकसान पहुंचाने के प्रयास में सिर्फ ट्यूमर को हटाने का निर्णय ले सकते हैं। अन्य मामलों में, डॉक्टर को आपके लीवर के एक हिस्से को हटाने की आवश्यकता हो सकती है – जिसे ट्यूमर के साथ रिजेक्षन कहा जाता है।’’

लीवर हीमैंजियोमा का निदान आम तौर पर 30 से 50 वर्ष की आयु के लोगों में किया जाता है। इसके अलावा, लीवर में होने वाले ये रक्त के थक्के पुरुषों की तुलना में महिलाओं में पांच गुना अधिक होने की संभावना होती है। इन गांठों के विकसित होने का अभी तक कोई कारण पता नहीं चल पाया है, लेकिन कई षोधों से यह पता चला है कि यह एक आनुवंशिक गड़बड़ी हो सकती है, या यह जन्मजात हो सकती है। लीवर के इन ट्यूमर की वृद्धि का संबंध शरीर में एस्ट्रोजन के स्तर में वृद्धि के साथ हो सकता है, खासकर गर्भावस्था के दौरान।

डॉ. उपाध्याय ने कहा, ‘‘इसके अलावा, चिकित्सक हेपेटिक आर्टरी लिगेषन नामक सर्जिकल प्रक्रिया के माध्यम से या आर्टेरियल एम्बोलिज़ेशन नामक इंजेक्शन के माध्यम से ट्यूमर में रक्त की आपूर्ति को रोकने की कोशिश कर सकते हैं। दुर्लभ मामलों में, जब हीपैटिक हीमैंजियोमा का आकार और दायरा अधिक होता है, तो इसे ऊपर उल्लिखित अन्य प्रक्रियाओं द्वारा नहीं निकाला जा सकता है, तो ऐसे मामलों में लीवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता हो सकती है। इसके अलावा, ट्यूमर के आकार को छोटा करने के लिए रेडियेषन थेरेपी का विकल्प अपनाया जा सकता है।’’

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