‘अनमैचेबल स्टेट्समैन’ भारतीय राजनीति का अटल योद्धा, न भूतो न भविष्यति

लगभग 50 साल तक देश के सांसद रहे ,तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी आज हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन मन नहीं मानता हैं, किसी को विश्वास नहीं हो रहा है कि संसद में अपनी आवाज और ओजस्विता से विरोधियों की बोलती बंद करने वाला खामोश हो जाएगा। ऐसा लगता है कि अटल जी आज भी हैं, उनका अमर कृतित्व, उनकी ओजस्विता, उनकी वाकपटुता, उनका सहज लेकिन गंभीर अंदाज हर भारतीयों के मन में अटल हैं। देश भला इतनी आसानी से अपने स्टेट्समैन को कैसे भूला सकता है। अटल जी स्वयं कहा करते थे कि मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? जब कभी वैश्विक मंच पर वक्ता को याद किया जाएगा, जब कभी प्रखर कवियों का जिक्र होगा, जब कभी सर्वकालिन राजनीति के शिखर पुरूष का जिक्र होगा, तब महान अटल बिहारी वहां मजबूती से दस्तक देंगे। आज लोग एक दो दल का गठबंधन नहीं चला पाते हैं, अटल जी ने 20 से अधिक दलों का गठबंधन कर पूरे पांच साल सरकार चलायी थी। वह एक मात्र ऐसे गैर कांग्रेसी पीएम रहे जिन्होंने अपना पूरा कार्यकाल पूरा किया।

अटल बिहारी वाजपेयी कभी दल विशेष के नेता नहीं रहे, वह तो भारत के नेता थे। उन्हें भारतीय नेता के रूप में जाना जाता रहा। वह पक्ष में रहे या विपक्ष में हर समय वह सबके प्रिय होते थे, हर कोई उनकी बात को सुनता था। पंडित नेहरू से लेकर नरसिम्हा राव सब वाजपेयी की ओजस्विता और नेतृत्व कौशलता के कायल थे। जब सदन में नौजवान अटल बिहारी बोलते थे ,तो तब के प्रधानमंत्री युवा अटल की एक- एक बात ध्यान से सुनते थे। वर्ष 1957 में अटल जी पहली बार संसद में पहुंचे थे, तब पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। ऐसा कहा जाता है कि अटल जी की भाषण शैली से जवाहर लाल नेहरू इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने कहा था कि ये नवयुवक कभी न कभी देश का प्रधानमंत्री ज़रूर बनेगा। 1993 में जब जेनेवा में मानवाधिकार सम्मेलन का आयोजन किया गया तब पी वी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने दलगत भावना से उपर उठकर अटल बिहारी वाजपेयी को विपक्ष का नेता होने के बाद भी संयुक्त राष्ट्र संघ में देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा था। पूरी दुनिया इस फैसले से हैरान थी कि विपक्ष का नेता सरकार की तरफ से बात रखने आया है। सामान्य तौर पर भारतीय राजनीति में ऐसा होता नहीं है। लेकिन यह अटल की सर्व स्वीकार्यता थी कि वह कभी दल विशेष की सीमाओं में बंधे नहीं।

अटल जैसा कोई नहीं : सच कहा जाए तो भारतीय राजनीति में कई सरीखे नेता हुए, लेकिन कई मायनों में अटल बिहारी सबसे अलग थे। चाहे राजनीति की रणनीति कौशलता की बात हो या वाक्पटुता की। बात उनके व्यवहार या विचार की हो या उनके चिंगारी भरे कविताओं की, अटल का कोई जोड़ नहीं था। यही कारण है कि जब वे बोलते थे तो विपक्षी भी ताली बजाते थे। विपक्ष भी मानता था कि वह उनके विपक्ष के नेता हैं, विरोधी नहीं। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब ‘कोएलिशन ईयर्स’ में अटल बिहारी के अनमैचेबल स्टेट्समैन होने की बात स्वीकारी है।

हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाया : 1977 में मोरार जी देसाई की सरकार में अटल विदेश मंत्री थे। इस दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया था और दुनियाभर में हिंदी भाषा को पहचान दिलाई, हिंदी में भाषण देने वाले अटल भारत के पहले विदेश मंत्री थे।

कारगिल विजय अटल जी ने लगातार कोशिश की कि पाकिस्तान से रिश्ते बेहतर हो, उन्होंने लाहौर तक बस से सफर कर दोस्ती की नींव भी रखी पर पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहींं आया। वह लगातार भारतीय सीमाओं पर आक्रमण करता रहा। जिसके बाद अटल ने भी पाकिस्तान को करारा जवाब दिया और पाकिस्तान को कारगिल युद्ध में मुंह की खानी पड़ी थी। आज अटल जी हमारे बीच नहीं है। पर देश के लिए उन्होंने जो ध्येयपथ बनाया है, जो मार्ग दिए है, जो व्यवहारिक,वैचारिक और राजनीतिक आदर्श स्थापित किए है, वह करोड़ों भारतीयों के लिए जीवनपर्यंत प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।

पोखरण परीक्षण का साहसिक फैसला वाजपेयी को देश की सामरिक सुरक्षा पर समझौता गंवारा नहीं था। वैश्विक चुनौतियों के बाद भी 1998 में राजस्थान के पोखरण में पांच परमाणु परीक्षण किया। इस परीक्षण के बाद अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोपिय देशों की तरफ से भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया गया।लेकिन उनकी अटल इच्छा शक्ति इन परिस्थितियों में भी अडिग रही।

जब नेहरू की तस्वीर लगवाई थी : 1977 में जब वाजपेयी विदेश मंत्री के रूप में अपना कार्यभार संभालने साउथ ब्लॉक के अपने दफ़्तर गए तो उन्होंने यह पाया कि दीवार पर लगा नेहरू का एक चित्र ग़ायब है।उन्होंने तुरंत अपने सचिव से पूछा कि नेहरू का चित्र कहां है, जो यहां लगा रहता था। उसके बाद वाजपेयी ने आदेश दिया कि उस चित्र को वापस लाकर उसी स्थान पर लगाया जाए जहां वह पहले लगा हुआ था। वाजपेयी ने संसद में स्वयं इस बात का जिक्र किया था। – इंद्रभूषण मिश्र।

इंद्रभूषण मिश्र

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