कानपुर- पुखरायां रेल हादसे का एक साल : हादसे में बचे एक यात्री की कहानी उसी की जुबानी


माय टाइम्स टुडे। आज के समय में हमारे पास यातायात के अनेक साधन हैं। लेकिन रेलगाड़ी आवागमन का एक प्रमुख साधन है । इससे यात्रा करने का अपना अलग ही मजा है । आप लोगों के साथ मैं अपने जीवन की एक वास्तविक घटना को बताना चाहूंगा जो आज ही के दिन ठीक एक वर्ष पूर्व की है।

नवंबर का महीना था, मौसम सुहावना और यात्रा के लिए सुखद था । मुझे अपने एक संबंधी की पुत्री के विवाहोत्सव में सम्मिलित होने के लिए भोपाल से जौनपुर जाना था । 24 नवंबर को शादी थी , इसलिए मैंने 19 नवंबर की शाम की गाड़ी 19321 इंदौर-राजेंद्रनगर से प्रस्थान करने का निश्चय किया । मेरे मित्र विनय कुशवाहा ने मुझे बस स्टैंड तक छोड़ा और मैं स्टेशन पहुंच गया। स्टेशन पहुंचने के लगभग एक घंटे बाद ट्रेन आई और मैं उसमें सवार हो गया। लगभग आठ बजे गाड़ी भोपाल से रवाना हुई। भोपाल से जब गाड़ी छूटी तब बिजली की रोशनी से शहर चमक रहा था  और ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी । खिड़कियाँ खुली हुई थीं, नींद के झोंके आ रहे थे । लग्न का सीजन था और यही एक मात्र साप्ताहिक गाड़ी थी जो  भोपाल, झांसी, कानपुर, लखनऊ, फैजाबाद और  वाराणसी होते हुए पटना जाती थी। इसलिए पूरा डिब्बा यात्रियों से भरा हुआ था । अपनी नींद से लड़ता-झगड़ता मैं चुपचाप बैठा रहा । कई स्टेशन आए और निकल गए । एक्सप्रेस ट्रेन होने की वजह से केवल बड़े-बड़े स्टेशनों पर ही रुकती थी । लगभग आधी रात को गाड़ी झांसी पहुंचीं और एक सज्जन ने अपनी ऊपर की बर्थ पर आराम करने का अवसर दिया। वहां से गाड़ी आगे बढ़ी और एक घंटे बाद कुछ आवाज हुई और गाड़ी खड़ी हो गई, पूछने पर पता लगा कि कोई जानवर टकरा गया था। फिर 10 मिनट बाद गाड़ी आगे बढ़ गई। आधी रात से ज्यादा बीतने की वजह से सभी सहयात्री हो गये। गाड़ी तेज स्पीड से आगे बढ़ने लगी और मैं भी सो गया।

रात्रि का तीसरा पहर था अधिकांश लोग सो रहे थे और अन्य भी नींद लेने का प्रयास कर रहे थे । अचानक तभी एक बहुत जोरदार धमाका हुआ और बहुत जोर का धक्का लगा । क्षण भर में पूरा डिब्बा अस्त-व्यस्त हो गया । झटका इतना तीव्र था कि किसी का सिर दीवार से टकराकर लहूलुहान हो गया था तो कई सामानों के नीचे दबे पड़े थे ।  सौभाग्य से मैं ऊपर की सीट पर था मेरे हाथ में एकाएक सीट की जंजीर आ गई और किसी तरह बाहर निकला। भगवान की कृपा, माता-पिता, गुरुजन और बड़ों के आशीर्वाद से मुझे चोट नहीं लगी । मेरी बोगी भी पलट गई थी और उस समय सुबह के 3 बज  रहे थे। इस अचानक आए संकट से कुछ क्षण के लिए मैं विचलित हो उठा । कुछ समझ  में ही नहीं आ रहा था। काफी देर बाद हमें पता चला कि हमारी ट्रेन पटरी से उतर गई है।
अन्य लोग भी किसी तरह से अपने डिब्बे से बाहर आ रहे थे। बाहर आकर मैंने जो हृदय विदारक दृश्य देखा उससे मेरा रोम-रोम सिहर उठा ।

 हमारी गाड़ी का इंजन सहित कई डिब्बा पटरी से उतर चुका था और 3 डिब्बे पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए थे। चारों ओर अफरा-तफरी मची हुई थी । लोगों की चीख-पुकार से सारा आकाश गूँज उठा था । कोई इधर भाग रहा था तो कोई उधर । अधिकांश लोग अब भी असमंजस की स्थिति में थे कि वे क्या करें । मैं दुर्घटनाग्रस्त डिब्बों के समीप गया । वहाँ का दृश्य तो रोंगटे खड़े कर देने वाला था । दुर्घटना उत्तर प्रदेश के पुखरायां कस्बे के पास हुई  थी जहां से कानपुर 53 किमी और उरई 55 किमी है, लगभग डेढ़ घंटे बाद सहायता दल आ गया और पूर्णरूप से बचाव कार्य में जुट गया। कई लोग दुर्घटनाग्रस्त डिब्बे के भीतर लहूलुहान फँसे पड़े थे । उनको भी एक-एक कर निकाला और बिना कोई देरी किए लोगों का प्राथमिक उपचार करने के पश्चात् घायलों को अस्पतालों की ओर भेजना प्रारंभ किया । लगभग दो दिन तक बचाव कार्य चला। इस दुर्घटना में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 150 लोग काल के गाल में समा गए और 400 से ज्यादा लोग घायल हुए।

20 नवंबर को बस से मैं पुखरायां से कानपुर होकर अपने घर आ गया । दुर्घटना का भयानक दृश्य मेरे मन-मस्तिष्क पर इतना छा गया था कि आज भी जब उस दुर्घटना की याद आती है तो उसका भयानक दृश्य आँखों के सामने साकार हो उठता है, तब मैं सिहर उठता हूँ ।

प्रदीप शर्मा 

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