हमारे लिए राष्ट्र महत्वपूर्ण होना चाहिए या राजनीति : मोहन भागवत

MY TIMES TODAY जिनके लिए मूल्य ही महत्व निर्धारित करता है उनकी प्राथमिकताओं का गलत होना स्वाभाविक है; ऐसे में, गलत प्राथमिकताओं से शिकायत करने के बदले प्रयास को सामाजिक विवेक के विकास पर केंद्रित करना चाहिए ;इसी में बुद्धि की सार्थकता और समस्त सामाजिक समस्याओं के समाधान की सम्भावना निहित है !

जीवन को जब सत्य के सामर्थ का ज्ञान प्राप्त होगा तो यथार्थ को महत्व अथवा प्रभाव के लिए असत्य के प्रपंच की आश्यकता ही नहीं रहेगी ; परन्तु सत्य का मार्ग सरल नहीं !

सत्य ही संघर्ष द्वारा व्यक्तित्व का निर्माण करता है, इसलिए, सत्य के मार्ग का चुनाव जीवन के लिए किसी संघर्ष की चुनौती से कम नहीं है, क्योंकि इस प्रक्रिया में जीवन के पास परिस्थितियों के आधार पर सिद्धांतों से समझौते की सम्भावना जो नहीं रहती !

ऐसे में ये सवाल उठना स्वाभाविक है की सत्य क्या है ??

आखिर अगर परिवर्तन ही श्रिष्टि का नियम है तो ऐसे क्या है जो परिवर्तनीय होते हुए भी सत्य है ! क्योंकि अगर सत्य किसी समय , परिस्थिति या घटना के सन्दर्भ तक सीमित रहेगा तो हो सकता है की वो सन्दर्भ द्वारा परिभाषित वास्तविक सत्य हो पर निसंदेह वह परम सत्य नहीं।

सत्य नित्य, नवीन, स्वतः व स्वाभाविक है; प्रतिदिन सत्य के इसी चरित्र का उदाहरण है जिसे जीवन अपने वर्त्तमान में जीता है पर संभवतः अनुकूलन की प्रक्रिया ने हमें उससे इतना अभ्यस्त कर दिया है की हम सत्य को महसूस ही नहीं करते।

वास्तविक सत्य और परम सत्य की समानता और अंतर को समझने के लिए आवश्यक है की विवेक को अपनी अनभिज्ञता का ज्ञान हो ; इसीलिए, स्वयं की अनभिज्ञता के ज्ञान को ही परम ज्ञान माना गया है।

ज्ञान का महत्व जीवन के प्रयास का विषय निर्धारित करती है और विद्या का यही प्रयोग एक बुद्धिमान और एक बुद्धिजीवी का अंतर भी है; सत्य का ज्ञान व्यक्ति को बुद्धिजीवी बनाता है और ज्ञान का आचरण द्वारा व्यवहारिक प्रयोग व्यक्ति को बुद्धिमान। देश में बुद्धिजीवी बहोत हुए , आज क्यों न हम बुद्धिमान बनें !

सत्य यह वर्त्तमान है जिसके लिए संभावनाओं के रूप में हमारा जन्म हुआ है, ऐसे में, यदि जीवन के निर्णय का आधार ही गलत हो जाए तो उसके प्रयास का विषय ही उसके जीवन को निरर्थक बना देगी, फिर, व्यावहारिक दृष्टि से प्रयास जितना ही सफल क्यों न हो।

वर्त्तमान की परिस्थितियां भी समस्याओं के माध्यम से हमारे विवेक की ही परीक्षा मात्र है; हम विशेष कुछ तो कर नहीं सकते पर जो कुछ भी कर सकते हैं अगर वो भी न करें तो हमारा निर्णय ही हमारी नियति का दोषी होगा।

जीवन अपने उद्देश्य के विषय, प्रयास की निष्ठा और समर्पण के माध्यम से ही बड़ा बन सकता है। बड़ा होना तो सभी चाहते हैं पर बड़ा होना सब जानते नहीं; तभी, अपनी समझ से बड़े होने के लिए सभी प्रयासरत तो दीखते हैं पर अपनी समझ को बड़ा करते कोई विरले ही दीखता है;

बड़े होने के नाते आदर और सम्मान की आकांक्षा तो सभी को होती है, और अपने निर्णय मात्र से अपने लिए भविष्य से आदर और सम्मान का अधिकार कमाने का अवसर सामान रूप से सभी को मिलता है , आज यह सौभाग्य संयोग से समय ने हमें दिया है तो क्यों न अपने कृत से इस वर्त्तमान में भविष्य के लिए उदाहरण बने;

क्या महत्व का निर्धारण धन के मूल्य के आधार पर करना उचित होगा? आज परिस्थितियों के षड्यंत्र के माध्यम से समय हमसे हमारा निर्णय जानने आया है, यह इतना कठिन भी नहीं,आखिर हमारे लिए महत्वपूर्ण क्या होना चाहिए , राष्ट्र या राजनीति, आप ही बताएं !”

साभार : फेसबुक पेज

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