विशेष लेख नमामी गंगे परियोजना स्वच्छता की ओर सार्थक कदम

*अजय कुमार चतुर्वेदी 

-“गंगा तेरा पानी अमृत झर झर बहता जाय, युग युग से इस देश की धरती तुझसे जीवन पाये, गंगा तेरा पानी….”मशहूर गीतकार साहिर ने जब 46 साल पहले 1970 में यह गीत लिखा था तब वास्तव में गंगा ऐसी ही थी। लेकिन आज गंगा इतनी विचलित है कि उसके अस्तित्व पर ही सवाल खडा हो गया है। ऐसे हालात कुछ दिनों में नहीं बने बल्कि लालच और भ्रष्टाचार के कारण पिछले तीन दशकों में यह हालत बने हैं जब गंगा को बचाने के लिए आन्दोलन छेडा गया।

गंगा सफाई के कई अभियान चले

मैली और प्रदूषित गंगा नदी को साफ करने के लिए समय समय पर कई कार्यक्रम और योजनाएं चली। केंद्र सरकार ने 1984 में गंगा सफाई की एक व्यापक कार्ययोजना बनाई। इसके लिए आठ हजार करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया। लेकिन भ्रष्टाचार के कारण सभी कार्यक्रम असफल साबित हुए और पता ही नहीं चला कि वे बीच में कब बन्द हो गये। हालांकि कुछ गैर सरकारी संगठनों के सफाई अभियान चलते रहे लेकिन संसाधनों और अर्थाभाव के कारण वे भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके। नतीजा गंगा मैली होती गई और गंगा सफाई के नाम पर राजनीति तेज होती गई।

बांधों ने गंगाजल का प्रवाह रोका?

लंबे समय से इस मुद्दे पर बहस चल रही है कि गंगा पर बने बांधों के कारण नदी का प्रवाह रुका है। गंगा पर बने टिहरी बांध का विरोध शुरू से होता रहा है। जानकारों का कहना है कि बांध निर्माण से नदी का स्वाभाविक प्रवाह प्रभावित होता है। कम जल के कारण नदी में प्रदूषण का स्तर भी बढता है।  कुंभ मेले के दौरान हरिद्वार और इलाहाबाद में साधुओं ने गंगा में कम पानी होने पर नाराजगी जताते हुए बांधों से पर्याप्त जल छोडने की मांग की थी। 

ठोस कार्रवाई तो 2014 से शुरू हुई 

गंगा मैया की गंदगी के प्रति सहानुभूति तो कईयों ने जताई लेकिन ठोस कदम किसी ने नहीं उठाए। यहाँ तक कि जिन राज्यों से गंगा गुजरती है उन्‍होंने भी कुछ खास नहीं किया और गंगा सफाई के लिए केन्द्र सरकार की तरफ ताकते  रहे। हां, चुनावों में जरूर मैली गंगा और उसकी सफाई का मुद्दा जोरशोर से उठाया जाता और सरकार बनाने के बाद सत्ताधारी दल इस मुद्दे को भूल जाते। कहते हैं न कि ऊपर वाले के यहाँ देर है अंधेरे नहीं। आखिर 2014 में वह दिन आया जब राष्‍ट्रीय गणतांत्रिक गठबंधन सरकार के मुखिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निर्मल गंगा के चुनावी वायदे को न सिर्फ याद रखा बल्कि उसे अमली जामा पहनाने की दिशा में ठोस काम शुरू किया।

अलग मंत्रालय बनाया 

प्रधानमंत्री ने सबसे पहला और बड़ा काम यह किया कि निर्मल गंगा के लिए अलग से एक मंत्रालय बनाया जिसका नाम दिया गया- जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण। पहले गंगा सफाई अभियान की जिम्मेदारी वन तथा पर्यावरण मंत्रालय की थी। नये मंत्रालय के तहत भारत सरकार ने जून 2014 में “नमामि गंगे कार्यक्रम” को मंजूरी दे कर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए। समग्र संरक्षण मिशन के इस कार्यक्रम के लिए बीस हजार करोड़ रुपये का भारी भरकम बजटीय प्रावधान भी कर दिया। निर्मल गंगा के लिए एकीकृत राष्ट्रीय गंगा संरक्षण मिशन के इस कार्यक्रम की सफलता के लिए निम्न आठ योजनाएं बनाई गई – सीवेज परिशोधन के लिए जरूरी ढाँचा विकसित करना, नदी की सतह की सफाई, वृक्षारोपण, नदी में गिरने वाले औद्योगिक कचरे की रोकथाम और निगरानी, नदी के किनारों का विकास, जैविक धरोहर का संरक्षण, जन जागरण और गंगा ग्राम विकसित करना। इन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को तीन चरणों में बांटा गया है। प्रारंभिक स्तर पर ऐसी गतिविधियां चलेंगी जिनके परिणाम जल्दी दिखाई देंगे। दूसरे चरण में मध्यम अवधि की ऐसी गतिविधियां चलाई जाऐंगी जो पांच साल की समयसीमा में क्रियान्वित की जा सकें। अंतिम चरण में वे योजनाएं होगी जो दस साल में क्रियान्वित की जा सकेगी।

नमामि गंगे कार्यक्रम की उपलब्धियां 

पांच राज्यों – उत्तराखंड,  उत्तर प्रदेश,  बिहार,  झारखंड और पश्चिम बंगाल में सीवेज प्रबंधन की 13 परियोजनाएं चल रही है। सीवेज प्रबंधन की 12 और परियोजनाएं इन राज्यों में शुरू की गई हैं। 1187.33 एम एल डी क्षमता की सीवर परिशोधन की परियोजना का काम भी इन पांच राज्यों में चल रहा है। इसके अलावा हरिद्वार के जगजीतपुर तथा वाराणसी के रामन्ना में पी पी पी मॉडल आधारित लम्बी अवधि (हाइब्रिड एन्युटी) की परियोजनाएं प्रारम्भ की गयी है।

नदी के किनारे को विकसित करने के लिए 28 परियोजनाओं, 182 घाटों और 118 श्मशान स्थलों की मरम्मत, आधुनिकीकरण तथा निर्माण की 33 परियोजनाओं पर काम चल रहा है।  11 स्थानों पर नदी की सतह और घाटों के आसपास सतह की सफाई और वहां से निकाले गए  कचरे को नष्ट करने का काम जारी है। जैविक धरोहरों के संरक्षण के तहत गंगा नदी में कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इनमें मत्स्य पालन और डाल्फिन संरक्षण तथा शिक्षा कार्यक्रम प्रमुख हैं। देहरादून, नरोरा, इलाहाबाद, वाराणसी और बैरकपुर में जैव – विविधता धरोहर संरक्षण के पांच केंद्र विकसित किए जा रहे हैं। गंगा नदी के दोनों किनारों के प्राकृतिक संरक्षण और वृक्षारोपण के बारे में वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून, भारतीय वन्यजीव संस्थान, पर्यावरण शिक्षा केंद्र आदि संबंधित संस्थाओं ने गहन  अध्ययन के बाद जो विस्तृत परियोजना रिपोर्ट दी उस पर कार्य शुरू हो गया है। पांच साल की इस कार्ययोजना पर 2016-2021 तक 2300 करोड़ रुपये का खर्च अनुमानित है। औषधीय पौधों के विकास की योजना उत्तराखंड के सात जिलों में चल रही है। जन भागीदारी पर भी विशेष बल दिया जा रहा है और जनता का जुड़ाव भी लगातार बढ़ रहा है।

गंगा किनारे स्थित 760 ऐसी औद्योगिक इकाइयों की पहचान की गई है जिनसे निकलने वाले कचरे से नदी सर्वाधिक प्रदूषित होती है। ऐसी 562 इकाइयों में कचरा निगरानी यंत्र लगाए गए हैं। प्रदूषण फैलाने वाली 135 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने के नोटिस जारी कर दिए गए हैं। शेष इकाइयों को अपने यहां कचरा निगरानी व्‍यवस्‍था निर्धारित समय में लगाने के निर्देश जारी किए गए हैं।

गंगा ग्राम विकसित करने की दिशा में पांच राज्यों – उत्तराखंड,  उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में गंगा किनारे बसी 1674 ग्राम पंचायतों की पहचान की गई है। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने इन ग्राम पंचायतों में शौचालय बनाने के लिए 578 करोड़ रुपये जारी किये हैं। इस धनराशि से 15 लाख 27 हजार 105 शौचालय बनाए जाने है। इनमें से 8 लाख53 हजार 397 शौचालय बनकर तैयार हो चुके हैं। गंगा नदी बेसिन योजना सात आई आई टी के समूह को सौंपी गई है। 65 गांवों को पूर्ण विकसित कर माडल गांव बनाने के लिए 13 आई आई टी संस्थानों ने इन्हें गोद लिया है। ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम और झारखंड को माडल राज्य के रुप में विकसित करने के लिए  के लिए  यूएनडीपी के साथ अनुबंध किया गया है। इस काम पर 127 करोड़ रुपये का खर्च अनुमानित है।

गंगा नदी को स्वच्छ  और निर्मल बनाने के लिए दुनियाभर में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ जानकारी और संसाधन प्राप्त करने के के प्रयासों के अलावा उन देशों से भी सहयोग लेने में संकोच नहीं किया जा रहा है जिन्हें नदी की सफाई में विशेषज्ञता हासिल है। आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, जर्मनी, फिनलैंड और इजराइल जैसे देशों ने गंगा संरक्षण में सहयोग देने की इच्छा जताई है। इनके अलावा मानव संसाधन विकास, रेलवे, पर्यटन, ग्रामीण विकास, पेट्रोलियम, युवा तथा खेल जैसे मंत्रालयों ने निर्मल गंगा कार्य योजना में हाथ बाटने के लिए सहयोग पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।

पहली बार स्थानीय निकायों का सहयोग 

स्वच्छ गंगा अभियान में पहली बार स्थानीय निकायों का सक्रिय सहयोग लिया जा रहा है। विशेषज्ञ इस पहल को अच्छा कदम बताते हैं और मानते हैं कि यह कार्य योजना इस बार अवश्य सफल होगी। पहले केंद्र गंगा सफाई के लिए राज्य सरकारों को धनराशि देता था। इस बार यह राशि राज्य सरकारों की बजाय सीधे स्थानीय निकायों को दी जा रही है। इससे न केवल उनकी भागीदारी बढी है बल्कि उन्हें जिम्मेदारी का भी एहसास हो रहा है। इसके अच्छे नतीजे भी आने लगे हैं। स्थानीय स्तर पर  गंगा संरक्षण कार्य बल का गठन एक ठोस कदम की शुरुआत है। इससे गांव के युवा को जहां रोजगार मिलेगा वहीं ग्रामीणों का भी भरपूर सहयोग मिलेगा। इस तरह का पहला कार्य बल उत्तर प्रदेश में तैनात किया गया है। चूंकि गंगा संरक्षण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रिय कार्यक्रम है इसीलिए प्रधानमंत्री कार्यालय इसकी सतत समीक्षा कर रहा है। इससे किसी भी बाधा को शीघ्र दूर करने में भी मदद मिलती है।

अगर सरकार इसी तरह ठोस और गंभीर प्रयास करती रही तो वह दिन दूर नहीं जब मैली गंगा निर्मल होकर झर झर बहने लगेगी। सरकार करोड़ों लोगों की आस्था की प्रतीक गंगा और गंगाजल की शुद्धता और पवित्रता भी बरकरार रखने की दिशा में गम्भीर प्रयास कर रही है।  गंगा को निर्मल बनाए रखने के लिए एक सशक्त जन आंदोलन की भी जरूरत है। तभी इसकी सफलता सुनिश्चित हो सकेगी।

लेखक भारतीय सूचना सेवा के वरिष्‍ठ अधिकारी रहे हैं और पर्यावरण संबंधी विषयों पर नियमित रूप से लिखते रहे हैं। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं।

 

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