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जिसे इतिहास का ज्ञान नहीं वो भारत का निर्माण नहीं कर सकता- राकेश सिन्हा

एमटीटी भोपाल। भोपाल में आयोजित यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव के उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता एवं विचारक प्रो. राकेश सिन्हा ने कहा कि जब व्यक्ति का वर्तमान कमजोर होता है तो वह अपनी विरासत में अपनी छवि देखता है और अपनी कमजोरी को विरासत की समृद्धि में छिपा लेता है। हमारे वेद-उपनिषद में क्या कहा गया है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हम आज क्या कह रहे हैं। उन्होंने बताया कि हमें अपने भविष्य को बनाने के लिए अपने इतिहास का अध्ययन करना चाहिए।

प्रो. सिन्हा ने इतिहास के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इतिहास विस्मृत करने के लिए नहीं है, स्मृति के लिए होता है। अब तक ऐसा इतिहास पढ़ाया गया, जो हमें विस्मृति देता है। भारत के विभाजन की घटनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश को सिर्फ 1947 में नहीं बाँटा गया,बल्कि भारत उसके पहले और बाद में भी विभाजित हुआ है।1962 में हमने अपनी जमीन खोई। 1937 में बर्मा भारत से अलग हुआ। उन्होंने बताया कि हमारे इतिहास में यह जिक्र नहीं है कि बर्मा किस प्रकार भारत से अलग हुआ। बर्मा को अलग करने के लिए जब जनमत कराया गया, तब 51 प्रतिशत से अधिक लोगों ने कहा था कि वह भारत के साथ रहना चाहते हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास को योजनापूर्वक धूल-धूसरित कर दिया गया है। जिस भारतीय को अपने इतिहास का सही ज्ञान नहीं है, वह भारत का निर्माण नहीं कर सकता। राष्ट्र को जानने के लिए सबसे पहले प्रत्येक भारतीय को यह जानना होगा कि वह कौन है? प्रो. सिन्हा ने महात्मा गांधी का जिक्र करते हुए बताया कि गांधीजी ने कहा था कि अंग्रेजी की किताबों का अनुवाद करने वाले कभी भी भारत का निर्माण नहीं कर सकते। हमें अपनी ज्ञान-परंपरा में उपलब्ध शास्त्र पढऩे होंगे और नये शास्त्र रचने होंगे।

नये और मौलिक विचार प्राप्त करना चाहता है युवा :

प्रो. सिन्हा ने कहा कि भारत का युवा नये और मौलिक विचार को प्राप्त करना चाहता है। उन्होंने कहा कि न थकने वाला और न हारने वाला युवा ही भारत को आगे बढ़ा सकता है। भारतीयता के संबंध में उन्होंने कहा कि भारत में जो भोग के उद्देश्य से आए,उन्होंने कभी इस देश को अपना नहीं माना। भारत ने भी उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया। जो भारतीय बनकर आएगा, उसे हम स्वीकार करेंगे और जो अभारतीय बनकर आएगा, उसे बाहर कर देंगे। उन्होंने बताया कि भारत में ‘संगम’ का बहुत महत्व है। हम माँ गंगा या नर्मदा में स्नान से जो पुण्य मिलता है, उससे भी अधिक महत्व ‘संगम’ में स्नान का है। हमें ऐसे भारत का निर्माण करना है, जिसमें सामाजिक न्याय हो, समरसता और समानता हो।

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युवाओं ने की थिंक टैंक के प्रतिनिधियों से चर्चा :

यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव में पहले दिन विभिन्न थिंक टैंक के प्रतिनिधियों के साथ युवा प्रतिभागियों ने चर्चा की। सीआईएस के पंकज सक्सेना, इंडिया फैक्ट के नितिन श्रीधर और स्वराजमार्ग के अरिहंत पावरिया ने युवाओं को विभिन्न विषयों पर परामर्श दिया।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांध समां :

कॉन्क्लेव में युवा प्रतिभाओं ने अपनी कला का प्रदर्शन भी किया। गीत-संगीत, नृत्य और अन्य विधाओं में अपनी प्रस्तुति से युवाओं ने सबका मन मोह लिया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में देश की सांस्कृतिक विविधता की झलक दिखाई दी।

कल इन विषयों पर होगी चर्चा :

12 अगस्त को बौद्धिक सत्र प्रात: 9 बजे से प्रारंभ हो जाएंगे। दूसरे दिन साई दीपक, आरवीएस मणि, राहुल रौशन, शुभ्रास्था,आलोक दुबे, कविता पाटीदार, अनुग्रह नागायिच और आशीष अग्रवाल सहित अन्य विद्वान युवाओं के साथ चर्चा करेंगे। सेवा,सामाजिक सुधार, महिला नेतृत्व, बौद्धिक नेतृत्व, उद्योग एवं व्यापार में युवाओं की भूमिका पर विचार-विमर्श किया जाएगा। इसके साथ ही इस बात पर भी चर्चा होगी कि सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक विमर्श की गुणवत्ता को कैसे सुधारा जा सकता है। वहीं, दूसरे दिन प्रज्ञाता, सृजन फांउडेशन, इंडिया फांउडेशन, इंडिक कलेक्टिव, ओपी इंडिया, निमित्तेकम, इंडिया इंस्पायर, गरुड प्रकाशन और प्रज्ञा प्रवाह के प्रतिनिधि क्रमश: आशीष धर, राहुल दीवान, रजत सेठी, साई दीपक, राहुल रौशन,ओमेन्द्र रत्नु, हर्षित जैन, अंकुर और श्रीकांत काटदरे उपस्थित रहेंगे। दो दिवसीय यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव का समापन 12 अगस्त को शाम 5:15 बजे होगा। समापन सत्र के मुख्य वक्ता प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार होंगे।

इस मौके पर कार्यक्रम की अध्यक्ष राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, प्रख्यात लेखक अरविन्दन नीलकंदन,प्रख्यात लेखक संक्रांत सानु ,माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश उपासने,  सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता मोनिका अरोरा आदि गणमान्य हस्तियां उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का संचालन अपूर्वा मुक्तिबोध ने किया और धन्यवाद ज्ञापन कॉन्क्लेव के संयोजक डॉ. संजीव शर्मा ने किया।

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आजादी के बाद ही हो जाना चाहिए था शिक्षा नीति में बदलाव- आनंदीबेन पटेल

एमटीटी भोपाल। भारत की पहचान उसकी ज्ञान-परंपरा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह देश महात्मा गांधी, भगवान बुद्ध और स्वामी विवेकानंद का है। इसकी नींव वसुधैव कुटुम्बकम पर रखी गई है। भारत में किसी भी समस्या का समाधान विचारों के मध्य संवाद से आता है। यह विचार मध्य प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने भोपाल में आयोजित दो दिवसीय यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव के उद्घाटन समारोह में व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि अनुशासन युवाओं का सबसे बड़ा गुण है। युवाओं को धैर्य, संयम और साहस की शिक्षा लेनी चाहिए। इसके साथ ही उन्हें संगठनात्मक एवं बौद्धिक नेतृत्व के गुण को भी विकसित करना चाहिए। युवाओं को बौद्धिक रूप से मजबूत बनना चाहिए। यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन में युवाओं को बहुत सीखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि यदि हमें दुनिया में आगे बढऩा है, तो नये-नये प्रयोग करने पड़ेंगे।

उन्होंने युवाओं द्वारा किए जा रहे सकारात्मक कार्यों का उल्लेख किया। इस अवसर पर उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) प्रेरणाकी सराहना की। यह वृत्तचित्र खरगौन में संचालित आस्था ग्राम संस्था के कार्य को दिखाया गया है, जो सभी प्रकार के दिव्यांग बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए समर्पित है। राज्यपाल ने बताया कि वह आस्था ग्राम में गईं हैं। वहाँ जो भी जाएगा, उसे समाज में ऐसे ही कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी।

लगभग 250 वर्ष पहले की भारतीय शिक्षा व्यवस्था का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि धर्मपाल जी की पुस्तक द ब्यूटीफुल ट्रीमें यह बताया गया है कि 700 से अधिक जनसंख्या पर गाँव में एक पाठशाला थी। अंग्रेजों के सर्वे में यह तथ्य सामने आए हैं। यह पाठशाला समाजकेंद्रीत थी। यहाँ पढ़ाने के लिए एक पंडित की नियुक्ति की जाती थी, जो सबको एक साथ पढ़ाते थे, लेकिन इसके बदले में किसी प्रकार का मानदेय नहीं लेते थे। उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति समाज स्वत: ही करता था। इन पाठशालाओं में ज्ञान के साथ-साथ संस्कार भी दिया जाता था। भारत को पूरी तरह जीतने के लिए अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया।

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राज्यपाल ने कहा कि शिक्षा में बदलाव स्वतंत्रता मिलते ही तत्काल हो जाना चाहिए था, लेकिन यह बीड़ा किसी ने नहीं उठाया। अब तक अंग्रेजों की बनाई व्यवस्था चली आ रही है। अब एक साथ बदलाव करना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि जब तक हमारी सोच में बदलाव नहीं आएगा,हम यह नहीं जानेंगे कि सही क्या है और गलत क्या है? तब तक हम एक साथ बदलाव नहीं कर सकते। लेकिन, तब तक हमें छोटे-छोटे बदलाव करते रहना होगा।

इस मौके पर कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में राज्यसभा सांसद और विचारक राकेश सिन्हा , प्रख्यात लेखक अरविन्दन नीलकंदन,प्रख्यात लेखक संक्रांत सानु ,माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश उपासने,  सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता मोनिका अरोरा आदि गणमान्य हस्तियां उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का संचालन अपूर्वा मुक्तिबोध ने किया और धन्यवाद ज्ञापन कॉन्क्लेव के संयोजक डॉ. संजीव शर्मा ने किया।