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आखिर हॉकी के साथ इतनी बेवफाई क्यों ?


माय टाइम्स टुडे।हमारा देश शुरू से ही खेल प्रेमी देश रहा है. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर उम्र के लोग खेलों में खासे दिलचस्पी रखते है.कभी जोश और जूनून का प्रतिक रहा खेल समय के साथ पेशा बन गया.पेशेवर होने के नाते सिस्टम का भी पेशेवर होना लाज़मी था. खेलों को मनोरंजन के साथ – साथ करियर के विकल्प के रूप देखा जाने लगा.जरूरत के हिसाब से यह सही भी है.निश्चिंत ही खेलों को बढ़ावा देना चाहिए जिससे कि युवा पीढ़ी को रोजगार के बेहतर मौके मिल सके. सरकार ने खेलों को बढ़ावा तो दिया पर समय के साथ साथ खेल कम राजनीति ज्यादा हावी हो गयी.टीम के चयन से लेकर बोर्ड के गठन तक राजनीति अपनी अहम भूमिका निभा रही है.अब तो खेलों को भी सियासत के तराजू पर तौल के देखा जाने लगा है. आजादी के पहले और आजादी के बाद तक हॉकी हमारे देश की रगों में बसा हुआ था. देश का बच्चा बच्चा हॉकी का दिवाना हुआ करता था. उस दौर में जब भारत को दुनिया ओछी नजर से देखती थी तब भारत ने हॉकी में ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीत कर दुनिया को अपना लोहा मनवाया था. लेकिन अस्सी के दशक के बाद हॉकी की लोकप्रियता कम होने लगी . 1983 में क्रिकेट विश्वकप जितने के बाद भारत में क्रिकेट का खुमार चढ़ने लगा. लोगों में क्रिकेट का जादू सर चढ़ के बोलने लगा. यकिनन विश्व कप जीतना हमारे लिए बड़ी उपलब्धी थी.देश को उसका जश्न अवश्य ही मनाना चाहिए था.पर अपने राजकीय खेल हॉकी को भूलाकर क्रिकेट की तारीफदारी करना भी तो स्वीकार नहीं किया जा सकता है. सिर्फ हॉकी ही क्यों कबड्डी, फुटबॉल, खोखो के साथ साथ कई प्रमुख खेलों का इसतरह से लुप्त होना कहां तक उचित है? ऐसा नहीं है कि इन खेलों में लोगों की रूची नहीं है, आज भी भारतीयों के दिलों में हॉकी ही पहला प्यार है. लेकिन जब से खेलों पर राजनीति हावी होने लगा तब से हॉकी के साथ अनदेखी होने लगी. प्रचार प्रसार के साथ आर्थिक रूप से भी हॉकी के साथ दोहरा व्यवहार होने लगा. आज बीसीसीआई दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड है वही हॉकी आज भी संसाधनों के लिए जूझ रही है. न तो खिलाडियों को समय पर कोच उपलब्ध हो पाता है न ही बेहतर संसाधन मिल पाते है. सरकार द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों में भी क्रिकेट ही हावी है .हॉकी तो लुप्त प्राय होती जा रही है. ओलंपिक में स्वर्ण पदक दिलाने वाले हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के लिए कई बार भारत रत्न की मांग उठी, लोगों ने अभियान भी चलाए पर यूपीए सरकार ने सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न से सम्मानित कर दिया.वही मौजुदा सरकार ने पद्मभूषण के लिए धोनी का नाम आगे बढ़ाया है. इन खिलाड़ियों सम्मानित करना गलत नहीं है पर ध्यानचंद की उपलब्धियों को भूलना कैसे स्वीकार किया जा सकता है ? ध्यानचंद के योगदानों को क्रिकेट की सियासत में भूलाना कहां तक उचीत है? क्रिकेट को बढ़ावा दीजिए पर भारतीयें के गौरव के लिए हॉकी को भी सहेजिए, संवारिये और हॉकी के नायक की अब और अनदेखी सही नहीं है.

लेखक : इंद्रभूषण मिश्र।

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