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उनका दर्द भला कौन समझे जो सारी रात करवटें बदलते रह गए

 

मॉय टाइम्स टुडे खेल में में हार जीत होती रहती हैं। हमेशा ना तो हम अच्छा खेल सकते है और न ही हर मैच जीत सकते है। इसलिए हमें हारने के बाद गम के साये में नहीं जीना चाहिए और अपनी गलतियों से सबक लेकर मजबुती के साथ कल के लिए खुद को तैयार रखना चाहिए । पर जिस देश में क्रिकेट को धर्म मानकर जीने वाले लोग हो, जिस देश में क्रिकेट के साथ जगने और क्रिकेट के साथ सोने वाले लोग हो। जहां क्रिकेट चालिसा का पाठ होता हो, जहां टीम की जीत के लिए यज्ञ – हवन होता हो वहां अगर भारत हार जाए और वह भी पाकिस्तान के साथ तो दिल को ग़म तो होगा हीं। रविवार को चैम्पिंयस ट्रॉफी के फाइनल में पाकिस्तान भारत को 180 रनों से हरा कर न सिर्फ पहली बार खिताब जीता बल्कि करोंड़ों भारतियों की उम्मिदों पर पानी भी फेर दिया। संडे का दिन, मस्ती, मुवी सब प्लान कैंसिल । मम्मी ने कहा खाना खा लो, मैंने कहा खा लूंगा थोडी़ देर से और मैच देखने लगा । जैसे हीं पाकिस्तान ने खेलना शुरू किया, उसके एक एक चौकों छक्कों के साथ भूख प्यास जाती रही और जब भारत के विकेट गिरने शुरू हुए तो अंदर से हिल गया और टीवी बंद कर दिया। ये कहानी सिर्फ मेरी नहीं हैं, उन भारतियों को भी इस दर्द से गुजरना पड़ा जिन्होने अपने गालो पर, बालो पर यहां तक की पूरे शरीर पर भारत और तिरंगे को बनवा रखा था। कितनों ने तो उपवास भी रखा था। कभी पूजा पाठ ना करने वाले भी भारतीय टीम के लिए भगवान से प्रार्थना कर रहे थे। पांड्या ने छक्के पर घक्के जड़ कर मरहम जरूर लगाया पर जख्म इतना गहरा था कि उबरना मुश्किल था। सदमा लगा, दिल के दौरे भी पड़े, रोना भी आया और अंत में गुस्सा इतना की टीवी फोड़ डाले, पोस्टर जला दिया। कैसे समझाऊं कि मेरे साथ करोडो़ भारतियो की रातें काश ! काश ! की कशमकश में करवटे बदलतें गुजर गयी।

इंद्रभूषण मिश्र…

लेखक पत्रकार कम कलम का पहरेदार अधिक है।