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चलिए आज आपको हम गया कि ऐतिहासिक धरती का सैर कराते हैं

 

MY TIMES TODAY.बिहार की राजधानी पटना से लगभग 92 किलोमीटर दूर गया जिले में स्थित महाबोधि मन्दिर एक पवित्र ऐतिहासिक बौद्ध मंदिर है। यह वही स्थान है जहाँ पर गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसकी संरचना द्रविड़ वास्तुकला की शैली में है।

माना जाता है कि सम्राट अशोक ने महाबोधि मन्दिर के स्तूप की स्थापना तीसरी शताब्दी ई.पू. में किया था। यह पहला बौद्ध मन्दिर  है जो पूरी तरह से ईंटों से बना है और वास्तविक रूप में अभी भी खड़ा है।वर्तमान मंदिर का निर्माण काल पांचवी शताब्दी माना जाता है। महाबोधि मन्दिर की केन्द्रीय लाट 55 मीटर ऊँचा है और इसकी मरम्मत 19वीं शताब्दी में करवाया गया था। महाबोधि मन्दिर चारों ओर से पत्थरों की बनी 2 मीटर ऊँची चहारदीवारी से घिरा है।कुछ दिवारों पर कमल बने हैं जबकि कुछ चहारदीवारियों पर सूर्य, लक्ष्मी और कई अन्य हिन्दू देवी-देवताओं की आकृतियाँ बनी हैं।

बोधी वृक्ष: 

महाबोधि मन्दिर के बोधि वृक्ष को श्री महा बोधि भी कहते हैं। इस वृक्ष को पवित्र माना जाता है क्योकि बौद्ध धर्मग्रन्थों के अनुसार गौतम बुद्ध को ज्ञान इसी पेड़ के नीचे प्राप्त हुआ था और इस ज्ञान प्राप्ति के बाद बोधि वृक्ष के लिये कृतज्ञता के भाव से उनका हृदय भर गया। कई शासकों ने इस वृक्ष को नष्ट करने का प्रयास किया लोकिन ऐसा माना जाता है कि हर ऐसे प्रयास के बाद बोधि वृक्ष फिर से पनप गया। आज का पेड़ शायद बोधि वृक्ष की पाँचवी पीढ़ी है।

विष्णुपाद मंदिर :

विष्‍णुपाद मंदिर, गया का एक आकर्षक स्‍थल है जो फाल्‍गु नदी के किनारे पर स्थित है यहां भगवान विष्‍णु के पैरों के निशान बने हुए है। यहां ब्रह्ममुंजी पहाड़ी, मंदिर से 1 किमी. की दूरी पर दक्षिणपश्चिम दिशा में स्थित है। यह एक रूचिकर स्‍थान है। इस पहाड़ी तक चढ़ने में खासा आंनद आता है। यहां से मंदिर का दृश्‍य शानदार दिखता है। विष्‍णुपाद मंदिर में भगवान विष्‍णु के पैरों के निशान, 40 सेमी. लम्‍बे और चांदी की परत से मढ़े हुए है। इसी स्थान पर पितरों को पिंडदान दिया जाता है।  इस मंदिर में एक मंडप है और आठ सुंदर नक्‍काशीदार खंभे है। पूरा मंदिर ग्रेनाइट का बना हुआ है। मंदिर परिसर में एक बरगद का वृक्ष है जिसे अक्षयवट कहा जाता है, इस वृक्ष के नीचे मृतकों के अंतिम संस्‍कार की रस्‍में की जाती है।

सात सप्ताह: 

महाबोधि मंदिर के परिसर में उन सात स्था्नों को प्रमुखता के साथ चिन्हित किया गया है जहां महात्मा बुद्ध ने ज्ञान की प्राप्ति होने के पश्चात आगामी सात सप्ताह व्यतीत किए थे।

दूसरा सप्ताह

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात महात्मा बुद्ध ने दूसरा सप्ताह जिस वृक्ष के नीचे बिताया था उस बोधि वृक्ष की पांचवीं पीढ़ी का पेड़ आज भी वहां मौजूद है। यहां बुद्ध की एक प्रतिमा भी बनी हुई है, जिसे अनिमेश लोचन कहा जाता है।

तीसरा सप्ताह

महाबोधि मंदिर का उत्तरी भाग ‘चंकामाना’ के नाम से पहचाना जाता है। इस स्थान पर बुद्ध ने निर्वाण के बाद तीसरा सप्ताह बिताया था। इस स्थान पर काले पत्थर से कमल का फूल बनाया हुआ है, जिसे बुद्ध का प्रतीक चिह्न माना जाता है।

चौथा सप्ताह

महाबोधि मंदिर के भीतर उत्तर-पश्चिम दिशा में एक भग्नावेष है, जिसे रत्नधारा से नाम से जाना जाता है। इस भग्नावेष की छत नहीं है। माना जाता है कि बोध की प्राप्ति के पश्चात बुद्ध ने चौथा सप्ताह यहीं बिताया था। लोककथाओं के अनुसार यहां रहने के मध्य बुद्ध गहन ध्यान में लीन थे तब उनके शरीर में से एक किरण निकली थी।

पांचवां सप्ताह

ऐसा माना जाता है कि ज्ञान प्रप्ति के बाद महाबोधि मंदिर के भीतर उत्तरी दरवाजे से कुछ दूरी पर स्थित अजपाला-निगोध्र वृक्ष के नीचे पांचवां सप्ताह बिताया था।

छठा सप्ताह

महाबोधि मंदिर के दाईं ओर स्थित मूचालिंडा झील के समीप बुद्ध ने छठा सप्ताह व्यतीत किया था। यह झी बहुत खूबसूरत और चारों ओर से फूलों से घिरी हुई है। इस झील के भीतर बुद्ध की मूर्ति स्थापित है जिसकी रक्षा एक सर्प कर रहा है।

बुद्ध की रक्षा

इस मूर्ति के साथ एक प्रचलित दंतकथा जुड़ी हुई है। जिसके अनुसार बुद्ध अपने ध्यान में लीन थे कि उन्हें खराब मौसम, आंधी-तूफान की भी परवाह नहीं रही। मूसलाधार बारिश में जब बुद्ध फंस गए तब सांपों के राजा मूचालिंडा ने अपने निवास से बाहर आकर उनकी रक्षा की।

सातवां सप्ताह :

बुद्ध की शरण

मंदिर के प्रांगण के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में एक राजयातना वृक्ष है, जहां बुद्ध ने अपना सातवां सप्ताह बिताया था। इस स्थान पर महात्मा बुद्ध बर्मा से आए दो व्यापारियों से मिले थे। इन व्यापारियों ने बुद्ध से शरण मांगी तो जवाब में बुद्ध ने बुद्धम शरणं गच्छामि का उच्चारण किया।

कैसे जाएं : 

गया बिहार की राजधानी पटना से लगभग 92 किलोमीटर है। गया जाने के लिए पटना से नियमित अंतराल पर ट्रेन चलती है। अगर आप बस या कैब से जाना चाहें तो भी ज्यादा समय नहीं लगेगा। दो – ढ़ाई घंटे में आप पहुंच सकते है। साथ ही अगर आप दिल्ली या एमपी की तरफ से आ रहे हैं तो मुगलसराय (दिनदयाल स्टेशन) से गया जाना बेहतर होगा। गया स्टेशन से बोध गया लगभग 12 किलोमीटर है। आप ऑटो या टैक्सी के माध्यम से जा सकते है। स्टेशन के पास ही खाने पीने तथा रहने की भी सुगम ब्यवस्था है।