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BHU का छात्र आंदोलन एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन का संकेत तो नहीं है : विशेष लेख


MY TIMES TODAY. आजकल देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में शुमार होने वाला वराणसी का बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) चर्चा में है. वजह है छात्रों का गुस्सा, उनका सड़कों पर आना और पुलिसिया हिंसा के बावजुद विश्वविद्यालय के खिलाफ जमकर आंदोलन करना. शायद यह पहला आंदोलन है जिसमें लड़कों की जगह लड़कियों ने आंदोलन का बिगुल फूंका है. आंदोलन के तुफान को आप इस बात से समझ सकते है कि इस आंदोलन ने पीएम से लेकर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ तक की चैन छीन लिया है. इस आंदोलन के बाद देश में सियासत का उफान अपने चरम पर है.विपक्ष भी मौके की नजाकत को समझ कर इस आंदोलन के राजनीतिकरण में कोई कसर छोड़ना नहीं चा रहा है. विपक्ष ने सीधे सीधे संघ और सरकार पर आरोप लगा कर सरकार को बैकफुट पर ला दिया है.वही सोशल मीडिया पर भी लोग सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे है. इस तरह छात्र आंदोलन का राजनीतिकरण होना कोई नई बात तो नहीं है पर एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन का संकेत जरूर है. आपको याद होगा कि सत्तर के दशक में जब इंदिरा सरकार थी तब बिहार के जय प्रकाश नारायण के आंदोलन ने सत्ता और सियासत के सिहासन को उलट पलट के रख दिया था. जेपी के आंदोलन के अन्य कारण भी जरूर थे पर जिसतरह से छात्रों ने आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई थी, गिरफ्तारियां दी थी, लाठियां खाई थी, वह कोई सामान्य घटना नहीं थी. इंदिरा गांधी जैसी साहसी पीएम भी आपातकाल लगाने पर मजबूर हो गयी थी. इंदिरा को आगामी चुनाव में हारना पड़ा था और तब केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी थी. आपको याद होगा कि पिछले वर्ष जेएनयू में भी मोदी सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई थी, कई दिनों तक लोकसभा – राज्यसभा के सत्र बाधित रहे थे, राहुल गांधी से लेकर केजरीवाल जैसे बड़े नेताओं ने इस आंदोलन में सीधे सीधे दखल दिया था. अभी जेएनयू का मामला थमा भी नहीं था कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित बेमुला की मौत ने एक और आंदोलन की नींव रख दी. उस आंदोलन में भी मोदी सरकार बैकफुट पर आ गयी थी.तत्तकालिन शिक्षामंत्री स्मृति ईरानी बार बार संसद में सफाई देने पर मजबुर हो गयी थी. इसीतरह आईआईटी मद्रास, एमयू, दिल्ली विश्वविद्यालय और एफटीआई पूणे में भी छात्रों के सरकार विरोध जोरदार तेवर देखने को मिले थे. इन सभी आंदोलनों का राजनीतिक नुकसान भी कहीं ना कहीं बीजेपी को जरूर उठाना पड़ा. इस साल भी जेएनयू के साथ साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में भी बीजेपी के छात्र संगठन एबीवीपी को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा.इसतरह से एक के बाद एक हो रहे छात्र आंदोलन तथा उन सभी आंदोलनों में नेताओं की भूमिका देखी जाए तो इन आंदोलनों के राजनीतिक परिदृश्य को समझा जा सकता है. अगर यह भी स्वीकार करना होगा कि राजनीतिक दल भी ऐसे मौकों का फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे है. चूंकि केंद्र में बीजेपी सरकार है और यूपी में भी योगी सरकार है . ऐसे में बीएचयू का आंदोलन कहीं न कहीं बड़े राजनीतिक परिवर्तन की तरफ इशारा कर रहा है.

लेखक : इंद्रभूषण मिश्र।

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