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धर्म के नाम पर तीन तलाक को जायज नहीं ठहराया जा सकता

MY TIMES TODAY. तलाक तलाक तलाक, तीन बार तलाक बोलकर किसी महिला को उसके घर से बाहर निकाल देना, उसके अधिकारों को छीन कर उसे जैसे तैसे जीवन जीने पर विवश कर देना, क्या यह एक सभ्य सामाज में स्वीकार्य है? क्या आपसी तू – तू मैं- मैं में एक महिला को एक झटके में तलाक तलाक तलाक कह कर उसको दर दर भटकने के लिए विवश कर देना जायज ठहराया जा सकता है ? ऐसे दौर में जब महिलाएं हर मोर्चे पर पुरूषों के साथ कदम से कदम मिला कर चल रही हैं। चाहे शिक्षा की बात हो, या खेल का मैदान हो या सीमा पर मुस्तैद होकर देश की रक्षा करने की बात हो, हर जगह महिलाएं धरती से लेकर स्पेस तक पुरूषों से कहीं आगे है। ऐसे समय में प्रश्न यह है कि धर्म की आड़ में महिलाओं का शोषण करना कैसे जायज ठहराया जा सकता है ? पिछले महीने सुप्रीम कोट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में तीन तलाक को खारिज कर दिया। कोर्ट ने तीन तलाक को असवैंधानिक करार देते हुए सरकार से कहा कि वह इसे रोकने के लिए कानून बनाए। एक तरफ जहां इस फैसले का स्वागत हुआ, महिलाओं ने जश्न मनाएं वही दूसरी तरफ धर्म के नाम पर सियासत की रोटियां सेकने वालों ने असहमती भी जतायी। इन लोगों ने धर्म की दुहाई देकर तीन तलाक पर रोक को इस्लाम के खिलाफ बताया। शरीयत और इस्लाम की आड़ में महिलाओं के अधिकारों को कुचलने वालों को यह जानना जरूरी है कि दुनिया के 22 मुस्लिम देशों में तीन तलाक पर रोक है। पाकिस्तान जैसे कट्टर मुस्लिम देश भी तीन तलाक पर बैन लगा चुका है। फिर भारत में तीन तलाक को बैन करना इस्लाम के खिलाफ कैसे हो सकता है ? कैसे किसी को धर्म के नाम पर महिलाओं की आजादी और हक छीनने की छुट दी जा सकती है? देश में आये दिन छोटी – छोटी बातों पर मुस्लिम महिलाओं के पति उन्हे तलाक देकर घर से बाहर कर देते है। इन महिलाओं को दर दर भटकना पड़ता है। अगर बाद में महिला वापस भी आना चाहे तो उसे हलाला, खुला जैसी घिनौनी प्रथा से गुजरना पड़ता है। जहां महिलाओं को शारीरिक शोषण के लिए विवश होना पड़ता है। सायरा बानो, शाहबानों से लेकर कई ऐसी महिलाएं है जो तीन तलाक की वजह से नरकीय जीवन जीने को मजबुर है। तीन तलाक की भयावहता इस बात से समझी जा सकती है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मेरठ मे जब पत्नी ने पति को इस फैसले की जानकारी दी तो पति ने नाराज हो कर उसे तलाक दे दिया । वही भोपाल में बिना दूध के चाय बनाने पर पति ने तलाक दे दिया। कोई फेसबुक पर तलाक देता है तो कोई फोन पर तलाक दे देता है। जरा सोचिए कि भारत जैसे महान देश में धर्म के नाम पर महिलाओं का उत्पीड़न करना सही है? क्या मुस्लिम समाज और तमाम मुस्लिम संगठन महिलाओं को सम्मान दिलाने के लिए, उन्हें उनका हक दिलाने के लिए सामने आयेंगे और तीन तलाक का विरोध करेंगे? बेहतर यही होगा कि धर्म के आड़ में खुद को बचाने की बजाए दुनिया के अन्य मुस्लिम देशों से सीख लेकर तीन तलाक का पुरजोर विरोध करें जिससे कि महिलाओं को भी अपनी जिंदगी जीने का अधिकार मिल सके। इंद्रभूषण मिश्र। 

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कौन है सायरा बानो : क्यों हो रही है तीन तलाक पर इनकी चर्चा ?

MY TIMES TODAY. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में तीन तलाक को असवैंधानिक घोषित करते हुए सरकार को 6 महिने के अंदर इस पर कानून बनाने की बात कहा है। कोर्ट के इस फैसले को लेकर देशभर में लोगों ने अपनी – अपनी प्रतिक्रिया दी है। कुछ लोग खुलकर कोर्ट के निर्णय के प्रति खुशी जाहिर कर रहे हैं तो कुछ लोगों की हताशा को भी साफ तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन इन सब के बीच सायरा बानो नाम की एक महिला विशेष तौर पर सुर्खियां बटोर रही है। कोर्ट के फैसले के बाद तमाम न्यूज़ चैनल, वेेब मीडिया और सोशल मीडिया पर सायरा बानो की खूब चर्चा हो रही हैैै । आईए जानते है कि कौन है सायरा बानों और क्यों हो रही है इनकी चर्चा …

इंदौर की रहने वाली मुस्लिम महिला शाहबानो को उसके पति मोहम्मद खान ने 1978 में तलाक दे दिया था। पांच बच्चों की मां 62 वर्षीय शाहबानो ने गुजारा भत्ता पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी और पति के खिलाफ गुजारे भत्ते का केस जीत भी लिया। सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी शाहबानो को पति से हर्जाना नहीं मिल सका। देश भर के मुस्लिम संगठनों ने कोर्ट के फैसले को पर्सनल लॉ में दखल बताते हुए इसका जमकर विरोध किया। इसको लेकर आंदोलन की धमकी दी गई। तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने उनकी मांग मान ली और तब एक कानून बनाया गया। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया गया। 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया। इस अधिनियम के तहत शाहबानो को तलाक देने वाला पति मोहम्मद गुजारा भत्ता के दायित्व से मुक्त हो गया था।

एक उत्तराखंड की शायरा बानो भी तीन तलाक की शिकार : एक समाचार पत्र द्वारा  लिए गए शायरा बानो के साक्षात्कार के कुछ अंश ….

2015 की बात है। काशीपुर उत्तराखंड में रहने के दौरान मेरे पति ने मुझे स्पीड पोस्ट से तलाक भेजा। मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। मुझ पर तो जैसे मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। मैनें खुद को परिवारवालों की मदद से संभाला। पहले तो कुछ समझ नहीं आया लेकिन बाद में मैंने लड़ाई करने की ठानी। इस संघर्ष में मुझे काफी लोगों का सहयोग मिला। इस कानूनी लड़ाई में मेरे भाई अरशद ने काफी साथ दिया। वह मुझे दिल्ली लेकर आया और यहां आकर मैं सुप्रीम कोर्ट में वकील बालाजी श्रीनिवासन से मिली। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह मुझे कानूनी सहायता देंगे। वकील साहब की मदद से याचिका तैयार की गई। फिर मैंने तीन तलाक के खिलाफ अर्जी दाखिल कर उसे गैर संवैधानिक घोषित करने और उसे निरस्त करने की गुहार लगाई। मुझे पूरा भरोसा था कि मुझे न्याय मिलेगा और फिर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने आज एक ऐतिहासिक फैसला दिया है।