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छठ विशेष : नहाय खाय के साथ छठ की शुरूआत जानिए किस दिन क्या है.


MY TIMES TODAY. छठ त्‍योहार बिहार और पूर्वी यूपी में विशेष रूप से मनाया जाता है.वैसे आज के दौर में छठ महापर्व की व्यापकता पूरे देश में फैल गयी है. भारत ही नहीं भारत के बाहर भी जहां भी इन क्षेत्रों के लोग है वो वहां पर छठ पूजा मनाते है. छठ महापर्व को सबसे पवित्र त्योहार माना जाता है.

यह महा पर्व साल में दो बार मनाया जाता है. पहली बार चैत्र महीने में और दूसरी बार कार्तिक महीने में. भगवान सूर्य की उपासना के साथ छठ पर्व की शुरुआत होती है. हिंदू धर्म में किसी भी पर्व की शुरुआत स्नान के साथ ही होती है और यह पर्व भी स्नान यानी नहाय-खाय के साथ होता है.

वास्तव में छठ महापर्व चार दिनों तक चलता है.आईए जानते है वो चार दिन कौन से है और कैसे होती है तैयारी..

नहाय खाय : छठ पर्व का पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी नहाय खाय के रूप में मनाया जाता है.नहाय-खाय के मौके घर की पूरी तरह से सफाई की जाती है. शुद्ध शाकाहारी भोजन बनाते हैं. इस दिन व्रती महिलाएं स्नान और पूजा-अर्चना के बाद कद्दू व चावल के बने प्रसाद को ग्रहण करती हैं.

खरना :छठ महापर्व का दूसरा दिन खरना कहा जाता है.  खरना में पूरे दिन का उपवास होता है और शाम के समय गन्ने का रस या गुड़ में बने हुए चावल की खीर का प्रसाद बनता है.यह प्रसाद लोगों को खिलाया जाताा है.

शाम का अर्घ्य : तीसरे दिन सूर्य षष्ठी को पूरे दिन उपवास रखकर शाम के समय डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इस दिन रात के समय छठी माता के गीत गाने और व्रत कथा सुनने की मान्यता है. इसी दिन को विशेष तौर पर छठ महार्व माना जाता है.इस दिन शाम में गंगा या अन्य घाटों पर भक्तों का जनसैलाब देखने को मिलता है.

सुबह का अर्घ्य : चौथे दिन सुबह के समय सूर्य निकलने से पहले ही घाट पर पहुंचना होता है और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इसके बाद घाट पर छठ मईया को नमन कर उनसे संतान-रक्षा का वरदान मांगना जाता है. अर्घ्य देने के बाद घर लौटकर सभी में प्रसाद बांट कर फिर व्रती खुद भी प्रसाद खाकर व्रत खोलते हैं.

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क्यों मनाया जाता है छठ ,क्या है छठ का महत्व


माय टाइम्स टुडे। दिवाली के 6 दिन बाद छठ का त्यौहार मनाया जाता है.ऐसे तो यह पूर्वी यूपी और बिहार में विशेष रूप से मनाया जाता है.लेकिन दिन पर दिन बढ़ती रही लेकप्रियता और महातम्य को देखते हुए देश के अन्य हिस्सों में भी छठ मनाया जा रहा है. आईए जानते है कि कब से और क्यों मनाया जाता है छठ महापर्व .

मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय फिर से अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था.

महाभारत- एक दूसरी मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी. सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की. कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था. सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था. आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है.

 छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा. तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। लोक परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी.
पुराण- पुराण में इस बारे में एक और कथा प्रचलित है। एक अन्य कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियवद की पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ. प्रियवद पुत्र को लेकर शमशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे.
उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि ‘सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं. राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो’. राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी.

छठ व्रत विधि (Chhath Vrat Vidhi in Hindi)

खाए नहाय: छठ पूजा व्रत चार दिन तक किया जाता है. इसके पहले दिन नहाने खाने की विधि होती है. जिसमें व्यक्ति को घर की सफाई कर स्वयं शुद्ध होना चाहिए तथा केवल शुद्ध शाकाहारी भोजन ही करना चाहिए.

खरना: इसके दूसरे दिन खरना की विधि की जाती है. खरना में व्यक्ति को पूरे दिन का उपवास रखकर, शाम के समय गन्ने का रस या गुड़ में बने हुए चावल की खीर को प्रसाद के रूप में खाना चाहिए. इस दिन बनी गुड़ की खीर बेहद पौष्टिक और स्वादिष्ठ होती है.

शाम का अर्घ्य: तीसरे दिन सूर्य षष्ठी को पूरे दिन उपवास रखकर शाम के समय डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के लिए पूजा की सामग्रियों को लकड़ी के डाले में रखकर घाट पर ले जाना चाहिए.शाम को सूर्य को अर्घ्य देने के बाद घर आकर सारा सामान वैसी ही रखना चाहिए. इस दिन रात के समय छठी माता के गीत गाने चाहिए और व्रत कथा सुननी चाहिए.

सुबह का अर्घ्य: इसके बाद घर लौटकर अगले (चौथे) दिन सुबह-सुबह सूर्य निकलने से पहले ही घाट पर पहुंचना चाहिए. उगते हुए सूर्य की पहली किरण को अर्घ्य देना चाहिए.इसके बाद घाट पर छठ माता को प्रणाम कर उनसे संतान-रक्षा का वर मांगना चाहिए. अर्घ्य देने के बाद घर लौटकर सभी में प्रसाद वितरण करना चाहिए तथा स्वयं भी प्रसाद खाकर व्रत खोलना चाहिए.