कविता : “तमन्नाओं का पिटारा “

एमटीटी। कविता।  मां हमारी चांद, और हम उसके तारे थे। वो बचपन के दिन भी , तमन्नाओं के पिटारे थे। कभी हवा के जहाजों में तैरने का सपना। कभी टाफियों की बरसात की उम्मीद पनपना। कुल्फी और फुल्की, हमारे शाही भोजन थे। एक छोटा सा राज्य हमारा,और हम उसके राजन थे। सोनपरी और जादुई कलम पर,हमको पूरा भरोसा था। राम – कृष्ण की कथाओं ने, हमको पाला पोसा था। एक तमन्ना रखते थे हम,जल्दी से बड़े होना है। पर ये ना सोचा बड़े होकर,बचपन को ही खोना है। वे केवल…

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