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#93 के अटल जी की 93 कहानियां: पहली कहानी- अटल कभी मरते नहीं

‘हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय’
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ राजनीति के एक युग का अवसान हो गया है। यह युग भारतीय राजनीति के इतिहास के पन्नों पर अमिट स्याही से दर्ज हो गया है। भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांतों को जानने के लिए अटल अध्याय से होकर गुजरना ही होगा। अटल युग की चर्चा और अध्ययन के बिना भारतीय राजनीति को पूरी तरह समझना किसी के लिए भी मुश्किल होगा। उन्होंने भारतीय राजनीति को एक दिशा दी। उन्होंने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना भी कठिन थी। उस भारतीय जनता पार्टी को पहले मुख्य विपक्षी दल बनाया और बाद में सत्ता के शिखर पर पहुँचाया, जिसके साथ लंबे समय तक ‘अछूत’ की तरह व्यवहार किया गया। उन्होंने भाजपा के साथ अनेक राजनीतिक दलों को एकसाथ एक मंच पर लाकर सही अर्थों में ‘गठबंधन’ के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। अपने सिद्धांतों पर अटल रहकर भी कैसे सबको साथ लेकर चला जाता है, यह दिवंगत वाजपेयी जी के राजनीतिक जीवन से सीखना होगा।
प्रखर और ओजस्वी वक्ता :
एक सांसद के रूप में अपने पहले कार्यकाल में ही अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में जो भाषण दिया था, उसे सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी अत्यधिक प्रभावित हुए थे, उन्होंने कह दिया था कि वह एक दिन देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। नियती ने उसी युवा अटल को पहले 13 दिन, फिर 13 माह और उसके बाद एक पूर्ण कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री के पद पर आसीन कर दिया। हम सब जानते हैं कि वह प्रखर और ओजस्वी वक्ता थे। अपनी वक्तत्व कला से वह सबको स्तब्ध और सम्मोहित कर देते थे। उनकी आवाज में ऐसा जादू था कि उनको सुनने के लिए दूर-दूर से लोग एकत्र आते थे। उनके देहांत के बाद जब उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया तब भी देश के कोने-कोने से ही नहीं अपितु विदेश से भी अनेक लोग आए। मानो, वे सब अंतिम बार अटल आवाज को सुनना चाहते हों।
देश का नेता कैसा हो, अटल बिहारी जैसा हो :
जननायक की अंतिम यात्रा में शामिल जनसमूह ने संदेश दिया है कि अटल जी सक्रिय राजनीति में थे तब और अब जब वह रहे नहीं तब भी देश की जनता उन्हें अपार प्रेम करती है। उनके जाने के बाद से देश में शोक की लहर है। लंबे समय बाद किसी नेता के जाने पर देश इस प्रकार शोक संतप्त है। सब अपने-अपने ढंग से अपने प्रिय नेता को याद कर रहे हैं। उन सबके पुण्य स्मरण का मिला-जुला संदेश यही है कि ‘देश का नेता कैसा हो, अटल बिहारी जैसा हो।’ जन-गण-मन से उठ रही यह गूँज आज के सभी राजनीतिक दलों और राजनेताओं को सुननी चाहिए। भले ही अटल सदैव के लिए गो-लोक धाम चले गए हों, किंतु जनता चाहती है कि उनका आचरण-चरित्र भारतीय राजनीति में उपस्थित रहे।


भारतीयता के ‘अटल’ प्रतिनिधि :

निश्चित ही अटलजी अजातशत्रु थे, जैसा कि उनके संबंध में कहा भी जा रहा है। उन्होंने कभी किसी से बैर नहीं ठाना। किसी के प्रति उनके मन में द्वेष और घृणा नहीं थी। वह व्यक्ति के विरोधी नहीं थे। बुराई के विरोधी थे। यद्यपि यह और बात है कि उनके वैचारिक विरोधी विशेषकर कम्युनिस्ट सदैव ही उनके प्रति ईर्ष्या का भाव रखते थे। अटल जी का प्रभाव और सामर्थ्य सदैव उनके वैचारिक विरोधियों की आँखों में किरकिरी बना रहा। यह लोग बहस के निचले स्तर पर जाकर अटल जी के प्रति अनर्गल टिप्पणियां करते रहे हैं। बहरहाल, जिसकी जैसी प्रवृत्ति, विचार और चिंतन होगा, उसका व्यवहार में उसी का प्रकटीकरण होगा। भारतीयता के ‘अटल’ प्रतिनिधि स्व. वाजपेयी जी ने सदैव अपने आचरण से राष्ट्रवादी विचार को प्रतिपादित किया। अपने विचार का विस्तार किया। उन्होंने अपनी वाणी और कर्म से भारत की चिति ‘हिन्दुत्व’ को देश-दुनिया के सामने रखा। उन्होंने अपने चरित्र से सबको हिन्दुत्व से परिचत कराया- ‘हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय।’
विचार के रूप में सदैव उपस्थित रहेंगे अटलजी :
एक पत्रकार से राजपुरुष तक की उनकी यात्रा कई मायनों में अद्भुत और अकल्पनीय रही है। उनके द्वारा खींची लकीर सदैव भारतीय राजनीति का मार्गदर्शन करेगी, यह विश्वास किया जा सकता है। अटलजी ने एक सपना देखा था कि उनकी पार्टी और विचार की गूँज देश के हर कोने से आए, आज जब उनका यह सपना साकार हो गया है, तब इस भरोसे के साथ उन्हें अंतिम विदाई कि वह भारतीय राजनीति में अपने विचार के रूप में सदैव उपस्थित रहेंगे।
लेख : लोकेंद्र सिंह
पत्रकार, लेखक, कवि व मीडिया शिक्षक (एमसीयू भोपाल)
साभार : https://apnapanchoo.blogspot.com/2018/08/Atal-never-dies.html?m=1
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विशेष : किसी दल के नहीं भारत के नेता ‘अटल बिहारी वाजपेयी’


माय टाइम्स टुडे। भारतीय राजनीति का अजातशत्रु कहलाने का गौरव अगर किसी को प्राप्त है तो वो अटल बिहारी वाजपेयी ही हैं. अटल बिहारी वाजपेयी कभी दल विशेष के नेता नहीं रहे, वह तो भारत के नेता है. उन्हें भारतीय नेता के रूप में जाना जाता है. करीब 5 दशक के राजनीतिक जीवन में न जाने कितने उतार-चढ़ाव देखने वाले वाजपेयी सबके प्रिय बने रहने की कला के महारथी थे.1993 में जब जेेेेनेवा में मानवाधिकार सम्मेलन का आयोजन किया गया तब पी वी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे . उन्होंने दलगत भावना से उपर उठकर अटल बिहारी वाजपेयी को विपक्ष का नेता होने के बाद भी संयुक्त राष्ट्र संघ में देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा था. पूरी दुनिया इस फैसले से हैरान थी . जब वो बोलते थे तो पूरा संसद उन्हें सुनता था. वे सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखते थे. उन्होंने 20 से ज्यादा पार्टियों का गठबंधन बनाकर सरकार को बखूबी चलाकर दिखाया था. वर्ष 1957 में अटल जी पहली बार संसद में पहुंचे थे तब पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे. ऐसा कहा जाता है कि अटल जी की भाषण शैली से जवाहर लाल नेहरू इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने कहा था कि ये नवयुवक कभी ना कभी देश का प्रधानमंत्री ज़रूर बनेगा. 

अटल जैसा कोई नहीं : 

सच कहा जाए तो भारतीय राजनीति में कई सरीखे नेता हुए. लेकिन कई मायनों में अटल बिहारी सबसे अलग थे. चाहे राजनीति की रणनीति कौशलता की बात हो या वाक्पटुता की. बात उनकेे व्यवहार या विचार की हो या उनके चिंगारी भरे कविताओं की, अटल को कोई जोड़ नहीं था. यही कारण है कि जब वे बोलते थे तो विपक्षी भी ताली बजाते थे. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब कोएलिशन ईयर्स में अटल बिहारी के अनमैचेबल स्टेट्समैन होने की बात स्वीकारी है. 

जब राजीव गांधी ने की थी मदद : 

अटल बिहारी ने एक बार कहा था कि अगर वह जिंदा है तो राजीव गांधी की वजह से ही है. उन्होंने कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है.  उन्होंने मुझे अपने दफ्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस अवसर का लाभ उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. तब मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं.

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये – अटल बिहारी वाजपेयी।

 


अटल को देखने पहुंचे दिग्गज : 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी वाजपेयी के स्वास्थ्य की जानकारी लेने एम्स पहुंचे. आधिकारिक बयान के अनुसार , मोदी ने डॉक्टरों से भेंट कर वाजपेयी के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली. साथ ही सरसंघचालक मोहन भागवत और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी भी उनका हालचाल जानने एम्स पहंचे. 

हालत स्थिर लेकिन अभी एम्स में रहेंगे :  

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की ओर से मंगलवार को जारी मेडिकल बुलेटिन में कहा गया है कि वाजपेयी का स्वास्थ्य स्थिर. फिलहाल चिंता की कोई बात नहीं है. हालांकि संक्रमण ठीक होने तक वे एम्स में ही भर्ती रहेंगे. 

इंद्रभूषण मिश्र।