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इलेक्ट्रानिक बस शुरू करने वाला पहला राज्य बना हिमाचल प्रदेश


mytimestoday. हिमाचल प्रदेश ने एक नयी पहल की शुरआत की है। परिवहन विभाग ने प्रदेश में इलेक्ट्रानिक बस सेवा शुरू किया है। हिमाचल प्रदेश इस अनोखी पहल की शुरूआत करने वाला पहला राज्य बन गया है। ये इलेक्ट्रानिक बसे कुल्लू मनाली से रोहतांग तक चलायी जा रही हैं। इसकी शुरूआत परिवहन मंत्री जीएस बली ने 21 सितम्बर 2017 को हरी झंडी दिखाकर की। उन्होने कहा कि कुल्लू और मनाली में आठ सीटर इलेक्ट्रिक कार भी चलायी जायेंगी।
विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल रोहतांग एवं उसके आस-पास के क्षेत्र में बढते हुए प्रदूषण को लेकर एनजीटी ने कड़ा रूख अपनाया था जिसके चलते यहां इलेक्ट्रिक बस चलाने की परियोजना बनायी गयी थी।
इलेक्ट्रिक बस की मुख्य बातें : 
प्रत्येक इलेक्ट्रिक बस में 30 यात्रियों की बैठने की व्यवस्था होगी। यह बस एक बार चार्ज होने पर 150-200 किमी का सफर तय करेंगी।ये बसे ऑफ सीजन में भूंतर एयरपोर्ट से कुल्लू-मनाली के लिये चलेंगी।इस बेड़े में कुल 10 बस होंगी। इस अनोखी पहल से हिमाचल प्रदेश ने इतिहास रच दिया है। इन इलेक्ट्रिक बसों का नाम हिम-तरंग दिया गया।

शिवम पोरवाल की कलम से…

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यात्रा वृतांत : चित्रकूट संगम भी सुंदर भी


@mytimestoday.राष्ट्र ऋषि नाना जी देशमुख और एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में चित्रकूट में दीनदयाल उपाध्याय शोध संस्थान की तरफ से भव्य ग्रामोदय मेले का आयोजन किया गया। यह मेला 24 फरवरी से 27 फरवरी तर चला। जिसमें देश के हजारो – हजारो लोगों ने भाग लिया। सौभाग्य से मुझे भी अपने विश्वविद्यालय की तरफ से इस मेले में शामिल होने का अवसर मिला। 23 फरवरी को सुबह 8 बजे हम सभी भावी पत्रकार मित्र अपने गुरूजनों के साथ बस में सवार होकर निकल पड़े नाना जी की कर्मभूमि का दर्शन करने। भोपाल की सुबह की हल्की – हल्की सर्दी में मीठी- मीठी हवाओं के झोकों के बीच झुमते गाते, हंसते – हंसाते सफर की बात ही कुछ और थी। सफर लंबा था इसलिए बीच – बीच में रूक कर थोड़ा भोजन, चाय, पानी भी जरूरी था। रात के करीब 11:30 बजे हम चित्रकूट पहुंच गए। मेले के आयोजको ने हमारे लिए खाने तथा रहने की ब्यवस्था की थी। भोजन के बाद हम सभी सैनिक भवन पहुंचे जहां हमारे लिए ठहरने की ब्यवस्था की गई थी। सभी थके भी थे इसलिए हमसभी जल्दी सो गए और फिर सुबह तैयार होकर निकल पड़े नाना जी की तपोभूमि का दर्शन करने। सबसे पहले हम ग्रामोदय मेला पहुंचे, वहां अल्पाहार किया और फिर अपने गुरूजनों के मार्गदर्शन में हम सभी अपने – अपने काम मे लग गए। मेले के उद्घाटन सत्र से पूर्व इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र दिल्ली से आये कलाकारों ने अपनी अनूपं लोकनृत्य का प्रदर्शन कर सबका मन मोह लिया। छत्तीसगढ़ का पंथी, नाचा केरल का पुल्ली टाईगर, सागर का बधाई, उत्तराखंड का हिल यात्रा आदि ने नगर के विभिन्न मार्गों से होते हुए मेले के मुख्य द्वार तक सांस्कृति शोभा यात्रा निकाली। मेले का उद्घाटन बिहार के राज्यपाल महामहिम रामनाथ कोविंद ने किया। उद्घाटन सत्र में भारत सरकार के केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत समेत अनेक राज्य मंत्री, सांसद, विधायक और समाज सेवी लोग शामिल हुए। इसके बाद हम सभी मीडिया सेंटर पहुंचे, सबने अपनी अपनी रिपोर्टिंग दी और फिर लोकेंद्र सर के मार्गदर्शन में समाचार पत्र की बारिकियों को समझने सिखने का मोका भी मिला। मीडिया सेंटर से अपना काम कर के हम सभी भोजन स्थल पहुंचे और फिर भोजन कर के रात्रि विश्राम के लिए सैनिक भवन निकल पड़े। 25 फरवरी की सुबह हम सभी तैयार होकर स्फटिक शिला पहुंचे | स्फटिक शिला सैनिक भवन से 2.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक ऐसी जगह है जहाँ प्रभु श्री राम के चरणों के निशान मिलते है | इतने बड़े निशानों को देख कर हम सकते में आ गये जब मालूम हुआ की अजानबाहू श्री राम चौदह फुट के थे | यह वो जगह है जहां श्री राम माता सीता का श्रृंगार कर रहे थे जब इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का भेस बना कर अपनी चोंच से सीता जी के पैर पर प्रहार किया | तब श्री राम ने उस पर तीर चलाया | जयंत तीनो लोकों में गया लेकिन उस तीर ने उसका पीछा न छोड़ा | तब हार मान कर उसने प्रभु और माता से क्षमा मांगी | किन्तु कमान से निकले हुए तीर को वापस लाना असंभव होता है इसलिए प्रभु ने वह तीर जयंत की आँख में मारा जिससे वह काना हो गया | और आजतक यह किवदंती है की कौवों को एक आंख से नही दिखता | स्फटिक शिला के दर्शन के बाद हम सभी पुन: ग्रामोदय मेला पहुंचे अल्पाहार किया और फिर मीडिया सेंटर पहुंचे। जहां देश के गणमान्य पत्रकारों से हमार संवाद हुआ, ग्रामिण पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं को सिखने समझने का मौका मिला। वहां से दोपहर का भोजन कर हम सभी पहुंचे राम दर्शन मंदिर जिसमे भगवान राम के वन गमन के वृतांत को सुंदर चित्रों के माध्यम से समझाया गया है। जिसमें पुत्र वियोग, भरत मिलाप, केवट संवाद, जटायु मरण, सीता हरण आदि को सुंदर कलाकृतियों के माध्यम से दर्शाया गया है।

राम दर्शन के बाद हम सभी बस में बैठ कर सती अनुसूइया आश्रम पहुंचे। मंदाकिनी नदी के किनारे बना यह मंदिर धार्मिक और आस्था की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। माना जाता है कि अत्रि ऋषि की पत्नी माता अनुसूइया जैसी पतिव्रता स्त्री सम्पूर्ण ब्रम्हांड में कोई और नहीं था , इस बात पर त्रिदेवियों को इर्ष्या हुई और उन्होंने तीनो देवों को माता अनुसूइया के पति धरम की परीक्षा लेने भेजा | तीनो देव भिक्षुक का रुप धारण कर उनके घर पहुंचे और उनसे भिक्षा मांगी | माता ने तुरंत उन्हें भिक्षा देनी चाही तो उन्होंने कहा कि वे भिक्षा तभी ग्रहण करेंगे जब माता निर्वस्त्र होकर उन्हें दान देंगी | माता ने अपने तपोबल से भगवन की लीला समझ गई और भगवान का ध्यान की जिसके फलस्वरूप तीनों देव बालक के रूप मे माता अनुसूइया के गोद मे खेलने लगे। तीनो देवियों को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उन्होंने माता से क्षमा मांग कर अखंड सौभग्य का वरदान लिया | यह स्थान सोम ऋषि , दत्तात्रेय ऋषि और दुर्वासा ऋषि का जन्म स्थान भी है।मंदिर में भगवान के चौबीसों अवतारो का सचित्र वर्णन भी है। मंदिर के दुसरे भाग मे परहंस स्वामी की समाधी भी है। माता अनुसूइया मंदिर के दर्शन करने बाद हमारा अगला पड़ाव था गुप्त गोदावरी । शाम को करीब 7 बजे हम सभी गुप्त गोदावरी पहुंचे ।
राम घाट से कुछ सत्रह किलोमीटर की दूरी पर स्थित गुप्त गोदावरी एक पर्वत श्रुंखला में बसी हुई दो गुफाएं हैं जहाँ माना जाता है कि श्री राम अपना दरबार लगाते थे | पहली गुफा ऊंची , चौड़ी और छोटी है जिसमे एक और सीता कुण्ड है भी है।यहाँ पर एक दन्त कथा मशहूर है कि सीता जी के स्नान करने के दौरान खटखटा चोर ने उनके वस्त्र चुरा लिए थे तो लक्ष्मण जी ने उसे तीर से ऊपर टांग दिया था | आज भी उस स्थान पर एक तीर नुमा पत्थर लटका हुआ है | गुफा में जाने का मार्ग बहुत ही संकरा है | अंदर की ओर एक अज्ञात स्थान से जल का स्त्रोत है जिसका आरंभ और अंत किसी को पता नही है | इसे गुप्त रूप से गोदावरी का उद्गम मानते हैं | दूसरी गुफा में जाने से पूर्व एक पंचमुखी शिवलिंग है | यह गुफा गहरी लम्बी और संकरी है जो हर समय पानी से भरी रहती है | यहां पर पानी घुटनों तक की गहराई तक है और पानी के अंदर पथरीली ज़मीन है | यहाँ साल भर सैकड़ो लोगों का आवागमन होता है लेकिन पानी एकदम साफ और स्वच्छ है | गुफा इतनी सकरी है की यहाँ एक बार में दो लोग भी नही जा सकते | इसके अंत में राम जी का एक छोटा सा मंदिर है | गुफा के दिवारों पर सुंदर कलाकृतिया भी है जो सहज ही हम सभी को अाकर्षित कर रही थी। गुप्त गोदावरी का दर्शन कर हम सभी पुन: ग्रामोदय मेला पहुंचे, भोजन किया और फिर लोक गायिका मालिनी अवस्थी जी के लोक गीतों का आनंद भी लिया। मालिनी जी ने सखी सईयां मिले लरकईयां, रेलिया बैरन पिया आदि लोक गीतों का गायन कर दर्शकों को झुमने पर मजबुर कर दिया। मालिनी जी को सुनने के बाद रात्रि विश्राम के लिए सैनिक भवन पहुंच गए। 26 की सुबह हम सभी जल्दी जगे और तैयार सेल्फी लेते हुए निकल पड़े । हमारा अगला पड़ाव कामदागिरी पर्वत था। कामदागिरी पर्वत सैनक भवन से करीब तीन किलोमिटर दूरी पर स्थित साढ़े पांच किलोमिटर में फैला हुआ पर्वत है। धार्मिक दृष्टि से कामदागिरी की परिक्रमा का विशेष महत्व है। परिक्रमा के मार्ग में अनेक छोटे बड़े मंदिर भी है। बीच में ऊपर पर्वत पर लक्षमण पहाड़ी भी है। करीब ढ़ेड़ घंटे चलने के बाद हमारी परिक्रमा पुरी हुई। परिक्रमा के बाद पसाद ग्रहण कर हमसभी पुन: ग्रामोदय मेला पहुंचे वहां मीडिया कार्यशाला में देश जाने मानेल पत्रकारों से ग्रामिण पत्रकारिता एवं गावों को स्वालंबी कैसे बनाया जाए विषय पर संवाद भी हुआ। उसके बाद दोपहर का भोजन कर हमने मेले का भ्रमण किया। देश के विभिन्न क्षेत्रों से आये दुकानों – स्टॉल का जायजा भी लिया। मेले में स्वदेशी निर्मित आंवले का मुरब्बा, लकड़ी के सामान, खादी के कुर्तें, काश्मीर शॉल और साड़ी तथा हरियाणा से आया युवराज सभी के लिए आकर्षण के प्रमुख केंद्र थे। मेलें में जैविक खेती, आजीविका तथा माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय का स्टॉल भी लगा था जहां पत्रकारिता एवं जनसंचार की महत्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध थी। मेला भ्रमण के बाद हमसभी ने सांस्कृतिक संध्या में सुप्रसिद्ध गायक मोहित चौहान के गीतों का मजा लिया तथा पुन: रात्रि विश्राम के लिए सैनिक भवन पहुंच गए। 27 फरवरी की सुबह हम सभी तैयार होकर मेला पहुंचे और अल्पाहार कर के अपने कार्यस्थल पहुंच गए। आज मेले का आखिरी दिन था इसलिए मेले में भीड़ भी बहुत थी। मेले के समापन समारोह में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक पूज्यनीय मोहन भागवत जी, केंद्रीय मंत्री राजिव प्रताप रूड़ी सहित अनेक मंत्री, सांसद मौजुद रहे। सरसंघचालक जी के उद्भोदन के बाद हम सभी ने भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया। यह भंडारा देश के दस हजार अठ्ठासी गावों के प्रत्येक घर से एक एक मुठ्ठी अनाज लेकर किया गया था। भंडारे में पक्तियों बैठ कर खाने का आनंद ही कुछ और था। आज हमारी यात्रा का अंतिम दिन था, हमें वापस भोपाल जाना था। जहां ऐसे अत्यंत मनोरम दृश्य हो, जहां की पर्वत चोट्टियों पर बने मंदिर आस्था के केंद्र हो, जहां की सोंधी- सोंधी मिट्टी, जहां कि हरियाली नाना जी की तप, त्याग और सेवा भाव के रुप में सबको छाया और शितलता प्रदान कर रही हो, भला किसका मन करेगा ऐसी जगह को छोड़ कर जाने का। चित्रकूट के लोगों ने, मेले के आयोजकों ने हमें जो स्नेह दिया, जिस तरह से हमारा आतिथ्य किया। इन चार दिनों मे ही हम उनके परिवार का एक हिस्सा हो गए। ना चाहते हुए भी भींगी भींगी आंखों को और अपने मन को बहलाते फुसलाते हुए बस में बैठ कर निकल पड़े राजा भोज की नगरी भोपाल के लिए। रास्ते में मित्रों की भजन मंडली का लुफ्त उठाते हुए, ठंडी – ठंडी हंवाओं में गुनगुनाते हुए, बैठे – बैठे सोते जागते सुबह चार बजे आखिर भोपाल पहुंच ही गए। इस प्रकार हमारी चार दिन की चित्रकूट यात्रा का सुखद, यादगार समापन हुआ।
इस यात्रा में हमें पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओ को सिखने- समझने के साथ- साथ एक पत्रकार के जीवन तथा क्रियाकलाप से रूबरू होने का अवसर मिला। साथ ही मार्गदर्शक के रूप में गुरूजनों का वात्सल्य लाभ भी मिला।