कविता मां बाप के घावों पर मरहम हैं बेटियां

“बेटियां”

सेवा हैं ,समर्पण हैं, उल्फत हैं बेटियां।
मां- बाप पे भगवान की रहमत हैं बेटियां।
बटवारे की इबादत बेटों ने जब लिखी।
मां बाप के घावों पर मरहम हैं बेटियां।
ज़ालिम सी ज़िन्दगी जब भी सताने लगी।
कामों की व्यस्तता में फुरसत हैं बेटियां।
ग़रीबी में भी राजा, जो एक रात में बना दे।
निश्चित मुनाफे वाली लागत हैं बेटियां।
संस्कारों की सिंचाई में हर पल लहलहाती।
झुककर प्रणाम करती आदत हैं बेटियां।
चिड़ियों सी चीरती हैं पंखों से आसमां को।
तर करतीं जो हलक को,वो शरबत हैं बेटियां।
रही जिस घर में वो,एकदम पराई बनकर।
अपने से उस घर की,बरकत हैं बेटियां।
उपवास पुत्र हेतु,है जग की रीत अजब सी।
देख राशन में कुछ कमी सी,जो रख लेती वो व्रत हैं बेटियां।

-Ritu Sahu

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One thought on “कविता मां बाप के घावों पर मरहम हैं बेटियां

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