कि मैं एक बेटी हूं – कविता

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धूप में भी,  छांव में भी,
खुशी और ग़म में भी,
ममता का आंचल समेटी हूं,
 हां मैं एक बेटी हूं……
दुनिया वालों ने क्या – क्या न जुल्म किये,
किसी ने रुलाया,
किसी ने सताया,
हवस के पापियों ने मेरे कपड़े तक को फार डाला,
हंसते खिलती कली को जीते जी मार डाला,
फिर भी,
मैं सबकुछ भूल गई,
प्यार और ममता की दरिया में घुल गई,
फिर से एक नए कल को बाहों में समेटी हूं,
हां मै एक बेटी हूं……..
हां मै एक बेटी हूं इसलिए  मुझे दुनिया वाले कमजोर और असहाय समझ के क्या क्या न जुल्म करते हैं।बेटे के जन्म पर उत्सव मनाते हैं, भोज भण्डारा करते हैं। पर अगर बेटी हुई तो समझो इनपे आफत आ गई। पुरा बचपन इनके सौतेलापन की धूप में जलता हैं और जब जवां हुई तो पापियों ने दहेज और ताड़ना की आग में जला दिया। किसी ने हवस की भूख मिटाई तो किसी ने देह पे जोर अजमाया । जिसको जैसे भला वैसे जी भर के भोग किया, मन भर गया तो कोठे पे बेच दिया।सोचो जिन सपनों को, जिन ख्वाबों को नौ महिने तक हंसते हुए झेला, उसी के लिए मैं बोझ बन गई। नारी ममता की देवी हैं, मां हैं, पालन हार हैं तो इनको ये भी याद रखना चाहिए कि नारी ताड़न हार भी हैं। सबकुछ सह कर भी माफ कर देती हूं ….कि मैं भारत की बेटी हूं।।
Mr.IBM
Pic : sweta rani

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