कि मैं एक बेटी हूं – कविता

धूप में भी,  छांव में भी, खुशी और ग़म में भी, ममता का आंचल समेटी हूं,  हां मैं एक बेटी हूं…… दुनिया वालों ने क्या – क्या न जुल्म किये, किसी ने रुलाया, किसी ने सताया, हवस के पापियों ने मेरे कपड़े तक को फार डाला, हंसते खिलती कली को जीते जी मार डाला, फिर भी, मैं सबकुछ भूल गई, प्यार और ममता की दरिया में घुल गई, फिर से एक नए कल को बाहों में समेटी हूं, हां मै एक बेटी हूं…….. हां मै एक बेटी हूं इसलिए  मुझे…

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