क्या पीके का तीर निशाने पर लगेगा ?

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एमटीटी। राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले प्रशांत किशोर तमाम अनुमानों और अटकलों पर विराम लगाते हुए जेडीयू में शामिल हो गए। पटना में हुई पार्टी की मीटिंग में बिहार के सीएम और पार्टी सुप्रीमो नीतीश कुमार की मौजूदगी में किशोर ने तीर का दामन थाम लिया। इस खबर के बाद बिहार की राजनीति में सियासी उबाल और चर्चाओं का दौर भी शुरू हो गया। प्रशांत किशोर लगभग एक दशक से राजनीतिक रणनीतिकार के रुप में काम कर रहे हैं। हालांकि अब वे सक्रिय भूमिका में राजनीति में शामिल हो गये हैं। एक रणनीतिकार के रुप में किशोर की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने सियासी गलियारे में कितनी सरकारें बनवाई है और गिराई भी हैं।

2014 के चुनाव में मोदी को जिताना हो या 2015 के चुनाव में बिहार में बीजेपी को बूरी तरह से हराना हो, किशोर की भूमिका अहम रही है। इतना ही नहीं किशोर ने पंजाब में भी कांग्रेस को जीत दिलवाई। लेकिन यूपी में पीके का जादू नहीं चल पाया था।

लेकिन अब किशोर एक नयी पारी शुरू करने जा रहे हैं। निश्चित रुप से उनक गेमचेंजर का अनुभव काम आयेगा। पर बिहार में महागठबंधन से पार पाना और नीतीश की पार्टी को मजबूत बनाना चुनौतिपूर्ण जरूर रहेगा। शायद यही वजह है कि नीतीश कुमार ने किशोर को पार्टी में शामिल किया है। नीतीश जानते हैं कि उनकी पार्टी कमजोर हुई है। जदयू के साथ लोगों का भरोसा भी पहले की तरह नहीं है। नीतीश कुमार एक बार बीजेपी से अलग हुए और फिर महागठबंधन से उन्होंने नाता तोड़ लिया। इस दोनों खेल में नुकसान कहीं न कहीं नीतीश का ही हुआ। आज नीतीश बीजेपी के साथ उस नीतीश कुमार की तरह नहीं जुड़े हैं जो पहले थे। या यह कहें कि नीतीश कुमार का एनडीए में उतना प्रभाव नहीं रहा जितना 2013 के पहले था। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि नीतीश कुमार ने जदयू के कम होते प्रभाव को वापस मजबूत बनने और एनडीए में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए किशोर को पार्टी में शामिल किया है।

बक्सर का अंकगणित ः

बक्सर की सीट का बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान है। इस सीट पर पिछले दो दशकों से बीजेपी का प्रभाव रहा है। यहां से दिवंगत भाजपा नेता लालमुनी चौबे लगातार चार बार सांसद रहे। वह 1996 से लेकर 2004 तक बक्सर से सांसद चुने गए। हालांकि 2009 में जगदानंद सिंह ने राजद की सीट से जीत दर्ज किया था और लालमुनी चौबे चुनाव हार गए थे। उसके बाद 2014 में मोदी लहर में अश्विनी कुमार चौबे को मौका मिला और वह भारी अंतर से चुनाव जीतने में भी सफल रहें। लेकिन इसबार चौबे के लिए यह सीट बचाना मुश्किल था। क्योंकि चुनाव जीतने के बाद से चौबे कुछ खास नहीं कर पाए हैं। बक्सर का मेन वोट बैंक सवर्ण समाज भी चौबे के काम से खुश नहीं है। ऐसे में यह पहले से कयास लगाया जा रहा था कि वह इसबार बक्सर की बजाए भागलपुर से चुनाव लड़ेंगे। हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि किशोर बक्सर से ही चुनाव लड़ेंगे, लेकिन यह तय है कि वह यदि बक्सर से चुनाव लड़ेंगे तो एनडीए के लिए फायदे का सौदा होगा। क्योंकि किशोर स्वयं बक्सर से आते हैं। उनके पिताजी बक्सर में लंबे समय से डॉक्टर हैं। उनका अपना भी अच्छा खासा जनसंपर्क है, साथ ही किशोर भी भली भांति बक्सर के मूड को समझते हैं।

पीके फैक्टर ः पीके के राजनीति में शामिल होने का फायदा जदयू के साथ – साथ एनडीए को भी होगा। क्योंकि पीके ने तीनों दलों के साथ काम किया है। वह बीजेपी के साथ भी काम किये हैं, उन्होंने महागठबंधन के साथ भी काम किया है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस के साथ भी काम किया है। ऐसे में यह तय है कि पीके तीनों दलों की नीतियों को बेहतर तरीके से समझते हैं।

रणनीति बनाने में माहिर ः पीके को रणनीति बनाने में माहिर समझा जाता है। चाहे 2014 में चाय पे चर्चा हो या 2015 में बिहार में बहार हो नीतीशे कुमार हो, पीके की यह नीति खासा लोकप्रिय रही थी। यहीं नहीं ‘कॉफी विद कैप्टन’ से भी उन्होंने कांग्रेस को पंजाब में सत्ता दिलवाई थी। अब देखना दिलचस्प होगा कि वह मिशन 2019 में क्या नारा और रणनीति तय करेंगे।

इंद्रभूषण मिश्र।

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