#93 के अटल जी की 93 कहानियां : दूसरी कहानी – विषम परिस्थितियों में भी अटल थे वाजपेयी जी

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एमटीटी। “देश एक मंदिर है, हम पुजारी है, राष्ट्रदेव की पूजा में हमें खुद को समर्पित कर देना चाहिए”। इस साधारण से वाक्य से किसी की देश के प्रति पूर्ण समर्पण और निष्ठा झलकती है। ये बातें एक ऐसे शख्सियत ने कही है जिसका न कि किसी जाति या संप्रदाय से संबंध था, था तो बस इंसानियत से, भारतवर्ष के लोगों से । अपनी सादगी और विनम्र स्वभाव से लोगों के दिलो-दिमाग में खास जगह बनाई। एक ऐसे प्रधानमंत्री जिन्होनें लोकतंत्र की ललाट पर अपने विजय की कहानी स्वयं रची। अपने नाम की तरह अपने काम के प्रति दृढ़ रहने वाले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय राजनीति के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखवाया है। आमतौर पर जितने साल लोग उम्र गवा देते है राजनीति में खुद को स्थापित करने में, उतने सालों की वाजपेयी जी ने संसदीय राजनीति की है। अपने 50 साल के इस राजनीति में पार्टी बनाना, पार्टी को 2 से 200 तक के आकड़े पर पहुंचाना, बिखरी पार्टी के जनता के समर्थन से आसमान तक पहुंचाना हर किसी के बस की बात नहीं होती है। अटल जी ने ऐसी राजनीति में महारथ हासिल कर सबको बताया कि उस वक्त उनसे बेहतर भारत का प्रधानमंत्री कोई हो ही नहीं सकता था। 1996-1998 के बीच में हो बार सरकार बनी पर बहुमत पूरी न मिलने पर गिर भी गई। एक समय तब था जब उन्हें महज 13 दिन बाद ही इस्तीफा देना पड़ा था, और एक दौर 1999 का था जब कारगिल वार में भारत को मिली विजय ने अटल बिहारी वाजपेयी को तीसरी बार भारत का प्रधानमंत्री बना दिया। जवाहर लाल नेहरु के बाद 3 बार प्रधानमंत्री बने, भारत के पहले ऐसे राजनेता जो 4 अलग-अलग प्रदेश से सांसद चुने गए।
राजनीति के प्रति रूझान कालेज के दिनों से ही था। एम.ए में फर्स्ट कलास डिग्री से सम्मानित वाजपेयी जी ने ग्वालियर के आर्य कुमार सभा से राजनीति में कदम रखा। उस समय आर्य समाज की युवा शक्ति माने जाते थे। 1939 में एक स्वयंसेवक की तरह वे राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में शामिल हो गये। 1944 में वे आर्य कुमार सभा के जेनरल सेक्रेटरी भी बने। वहां बाबासाहेब आप्टे से प्रभावित होकर, उन्होंने 1940-44 के दर्मियान आरएसएस प्रशिक्षण कैंप में प्रशिक्षण लिया और 1947 में आरएसएस के फुल टाइम वर्कर बन गये।
लॉ के क्षेत्र में भी अटल जी ने अपना हाथ अजमाया पर पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। लोगों से जुड़ाव उन्हें पत्रकारिता के करीब ले आया। विभाजन के बाद प्रचारक के रूप में उन्हें उत्तर प्रदेश भेज दिया गया, जहां उन्होनें पंडित दीनदयाल उपाध्याय के साथ राष्ट्रधर्म नामक हिंदी मासिक पत्रिका, पंचजन्य नामक हिंदी साप्ताहिक पत्रिका और दैनिक स्वदेश एवं वीर अर्जुन जैसे समाचार पत्रों के लिए काम करने लगे।
भारत रत्न, पद्म विभूषण और न जाने कितने पुरस्कारों से सम्मानित वाजपेयी जी लिखने की कला में भी अव्वल रहे। इसकी वजह इनके पिता कृष्णा बिहारी वाजपेयी रहे। वे अपने गांव के महान कवी थे, लेखनी की ताकत अटल जी को अपने पिता से प्राप्त हुई। इनकी रचना में तकरीबन 20 से ज्यादा किताबें और 50 से अधिक कविताएं शामिल है।
विशिष्ट छवि और प्रतिभा के धनी ऐसे कौशल व्यक्ति का भारत की भूमि पर जन्म लेना हर एक भारतीय के लिए गौरव की बात है।

लेख – तान्या गुप्ता..

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