आजादी के बाद ही हो जाना चाहिए था शिक्षा नीति में बदलाव- आनंदीबेन पटेल

एमटीटी भोपाल। भारत की पहचान उसकी ज्ञान-परंपरा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह देश महात्मा गांधी, भगवान बुद्ध और स्वामी विवेकानंद का है। इसकी नींव वसुधैव कुटुम्बकम पर रखी गई है। भारत में किसी भी समस्या का समाधान विचारों के मध्य संवाद से आता है। यह विचार मध्य प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने भोपाल में आयोजित दो दिवसीय यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव के उद्घाटन समारोह में व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि अनुशासन युवाओं का सबसे बड़ा गुण है। युवाओं को धैर्य, संयम और साहस की शिक्षा लेनी चाहिए। इसके साथ ही उन्हें संगठनात्मक एवं बौद्धिक नेतृत्व के गुण को भी विकसित करना चाहिए। युवाओं को बौद्धिक रूप से मजबूत बनना चाहिए। यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन में युवाओं को बहुत सीखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि यदि हमें दुनिया में आगे बढऩा है, तो नये-नये प्रयोग करने पड़ेंगे।

उन्होंने युवाओं द्वारा किए जा रहे सकारात्मक कार्यों का उल्लेख किया। इस अवसर पर उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) प्रेरणाकी सराहना की। यह वृत्तचित्र खरगौन में संचालित आस्था ग्राम संस्था के कार्य को दिखाया गया है, जो सभी प्रकार के दिव्यांग बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए समर्पित है। राज्यपाल ने बताया कि वह आस्था ग्राम में गईं हैं। वहाँ जो भी जाएगा, उसे समाज में ऐसे ही कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी।

लगभग 250 वर्ष पहले की भारतीय शिक्षा व्यवस्था का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि धर्मपाल जी की पुस्तक द ब्यूटीफुल ट्रीमें यह बताया गया है कि 700 से अधिक जनसंख्या पर गाँव में एक पाठशाला थी। अंग्रेजों के सर्वे में यह तथ्य सामने आए हैं। यह पाठशाला समाजकेंद्रीत थी। यहाँ पढ़ाने के लिए एक पंडित की नियुक्ति की जाती थी, जो सबको एक साथ पढ़ाते थे, लेकिन इसके बदले में किसी प्रकार का मानदेय नहीं लेते थे। उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति समाज स्वत: ही करता था। इन पाठशालाओं में ज्ञान के साथ-साथ संस्कार भी दिया जाता था। भारत को पूरी तरह जीतने के लिए अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया।

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राज्यपाल ने कहा कि शिक्षा में बदलाव स्वतंत्रता मिलते ही तत्काल हो जाना चाहिए था, लेकिन यह बीड़ा किसी ने नहीं उठाया। अब तक अंग्रेजों की बनाई व्यवस्था चली आ रही है। अब एक साथ बदलाव करना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि जब तक हमारी सोच में बदलाव नहीं आएगा,हम यह नहीं जानेंगे कि सही क्या है और गलत क्या है? तब तक हम एक साथ बदलाव नहीं कर सकते। लेकिन, तब तक हमें छोटे-छोटे बदलाव करते रहना होगा।

इस मौके पर कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में राज्यसभा सांसद और विचारक राकेश सिन्हा , प्रख्यात लेखक अरविन्दन नीलकंदन,प्रख्यात लेखक संक्रांत सानु ,माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश उपासने,  सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता मोनिका अरोरा आदि गणमान्य हस्तियां उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का संचालन अपूर्वा मुक्तिबोध ने किया और धन्यवाद ज्ञापन कॉन्क्लेव के संयोजक डॉ. संजीव शर्मा ने किया।

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