नीतीश – शाह “हर एक मुस्कुराहट मुस्कान नहीं होती”

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#ख_से_खबर। नफरत हो या मोहब्बत आसान नहीं होती, हर एक मुस्कुराहट मुस्कान नहीं होती। यह पंक्तियां बिहार की राजनीति में बहुत हद तक सही साबित हो रही हैं। इन दिनों बिहार में आगामी लोकसभा को देखते हुए एनडीए में सीटों के बंटवारे को लेकर सियासी पारा हाई है। अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि कौन कितनी सीटों पर चुुुुनाव लड़ेगा। सभी सहयोगी दल अपने- अपने दावे जरूर ठोक रहे हैं, पर खुलकर कोई न तो बोल पा रहा है न ही खामोशी की चादर ओढ़े सो पा रहा है। रह रह कर कुछ न कुछ सुगबुगाहटें सामने आ ही जाती हैं। अभी हाल ही में बीजेेेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बिहार आये थे। वह सीटों को लेकर नीतीश कुमार से मिले भी। मीडिया में दोनों नेताओं की मुलाकात ने बखूबी टीआरपी भी बटोरी, पर सीटों को लेकर कुछ भी साफ नहीं हो पाया। अमित शाह का दावा कि एनडीए में सबकुछ ठीक है और नीतीश के मुस्कुराने से क्या ये माना जा सकता है? कि सबकुछ सुलझ गया, सीटों पर बात बन गयी। दरअसल नीतीश कुुुुमार की मुस्कुराहटों को समझना इतना आसान भी नहीं है। जब से महागठबंधन से अलग होने के बाद नीतीश एनडीए में वापस आए हैं, वह पहले के नीतीश नहीं लग रहे हैं। बीजेपी के साथ उनकी मजबूती कम मजबूरी ज्यादा दिखायी दे रही है। कई मौके पर बीजेपी से अलग नीतीश का स्टैंड देखा गया है। इसके पहले केसी त्यागी भी नीतीश की तरफ से दिल्ली गए थे। लेकिन वहां भी कुछ बात नहीं बनी थी। केसी त्यागी के तेवर तो कुछ और ही बयां कर रहे थे। वह एनडीए में सबकुछ सही होने की बात तो कह रहे थे। लेकिन दूसरी तरफ यह भी इशारा कर रहे थे कि अगर कांग्रेस और राजद नरम रूख अपनाएं, तो महागठबंधन में वापसी भी हो सकती है। यहीं नहीं चार राज्यों में होने वाले चुनाव में भी जदयू बीजेपी से अलग है, वह सिर्फ बिहार में बीजेपी के साथ है। ऐसे में दोनों दलों के बीच प्रतिबद्धता भी समझी जा सकती है।

प्रश्न यह है कि सबकुछ ठीक होने के बाद भी स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं हो पा रही है? दरअसल बिहार में जदयू अपनी पकड़ खोना नहीं चाहता है। जदयू की कोशिश है कि वह बड़ी पार्टी की भूमिका में रहे। लेकिन बीजेपी के पास लोकसभा में सीटे ज्यादा है, उसको कम पर समझौता करना स्वीकार नहीं है। कुल 40 लोकसभा सीटों में से 22 बीजेपी के पास जबकि शेष सीटें लोजपा और रालोसपा के पास है।

ऐसे में अगर बीजेपी 22 सीटों पर भी मान जाती है तो उसके सहयोगियों खासकर के जदयू को खुश करना मुश्किल होगा। जदयू किसी भी किमत पर छोटे भाई की भूमिका के लिए तैयार नहीं होगी। अगर भाजपा अपनी सीटें कम करती है तो उसे अपने वर्चस्व के साथ – साथ अपने सांसदों के बागी होना का डर भी सताएगा। ऐसे में यह मान लेना कि नीतीश के मुस्कुराने का मतलब एनडीए में सबकुछ ठीक है और सीटों पर बात बन गयी ,शायद जल्दबाजी होगी।

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