कविता – न तुझको पता न मुझको पता

एमटीटी नेटवर्क। 

मैं जब भी देखता हूं,
तुझको ही देखता हूं,
क्यों देखता हूं,
ना तुझको पता न मुझको पता…
जब भी सोचता हूं,
तुझको ही सोचता हूं,
क्या ख़्याल है क्या हाल है
न तुझको पता न मुझको पता….
धूप है कि छांव है,
ना गति है न ठहराव है,
जहां तुम हो वहां मैं हूं
कैसे कहें किससे कहें
न तुझको पता न मुझको पता….#Mr.IBM

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