शिवराज की ‘किसान पुत्र’ की छवि को चोट पहुँचाने की रणनीति

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की’यूएसपी’ है- किसान पुत्र की छवि। यह छवि सिर्फ राजनैतिक ही नहीं, अपितु वास्तविक है। शिवराज सिंह चौहान किसान परिवार से आते हैं। उन्होंने खेतों में अपना जीवन बिताया है। इसलिए उनके संबंध में कहा जाता है कि वह खेती-किसानी के दर्द-मर्म और कठिनाइयों को भली प्रकार समझते हैं। किसानों के प्रति उनकी संवेदनाएं ही हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही किसानों की खुशहाली के लिए नीति बनाना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। वह पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने किसानों की आय दोगुनी करने का विचार दिया और उस पर नीतिगत प्रस्ताव बनाने की पहल भी प्रारंभ की। उनके इस प्रयास को वर्ष 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी आगे बढ़ाया है। कृषि के क्षेत्र में मध्यप्रदेश में हुए कामों को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ही 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के मध्यप्रदेश सरकार के रोड-मेप को विस्तार और साकार करने की जिम्मेदारी दी है।

            कांग्रेस यह भली प्रकार समझती है कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को हराना है, तो उनकी ‘किसान पुत्र की छवि’ को ही तोडऩा जरूरी है। इसलिए इस विधानसभा चुनाव में उतरने से पहले कांग्रेस किसानों को ही अपनी राजनीति के ‘टूल’ की तरह उपयोग कर रही है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि विधानसभी चुनाव-2013 ‘किसान पुत्र विरुद्ध महाराज’की पृष्ठभूमि में लड़ा गया था। एक तरफ सहज-सरल व्यक्तित्व के धनी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे और दूसरी ओर कांग्रेस चुनाव प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष एवं सिंधिया राजघराने के ज्योतिरादित्य सिंधिया थे। किसान पुत्र की छवि ने ही मध्यप्रदेश में शिवराज और उनकी सरकार का परचम बुलंद किया था। आगामी चुनाव में कांग्रेस किसी भी सूरत में भाजपा को जीतने नहीं देना चाहती, इसलिए उन्होंने मुख्यमंत्री और सरकार को ‘किसान विरोधी’ सिद्ध करने की रणनीति बनाई है। पिछले वर्ष से ही कांग्रेस ने इस पर काम करना भी प्रारंभ कर दिया है। जबकि शिवराज सरकार लगातार किसानों की खुशहाली के लिए प्रयत्नशील है।

            मध्यप्रदेश में कैसे किसानों के हित में सरकार काम कर रही है, इस बात को आसानी से और तर्कसंगत ढंग से समझना है, तो हमें लगभग 14 साल पीछे पलट कर देखना चाहिए। आज से 14 साल पीछे जाएं तब हम जान पाएंगे कि आखिर क्यों प्रदेश बदहाली के दौर से गुजर रहा था? उस वक्त प्रदेश में खेती के लिए न तो बिजली थी और न ही सिंचाई सुविधा। उत्पादन और लागत में बड़ा अंतर था। किसानों को 13-14 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण मिल पाता था। खेतों के लिए खाद और बीज भी किसान को उपलब्ध नहीं था। अब जरा तब की स्थिति की तुलना वर्तमान से कीजिए। आज मध्यप्रदेश के लगभग सभी ग्रामीण क्षेत्रों में औसतन 10घंटे बिजली मिल रही है। किसानों को अब ऋण पर ब्याज नहीं देना पड़ता, बल्कि उन्हें अब कर्ज ऋणात्मक दस प्रतिशत की ब्याज दर पर उपलब्ध कराया जा रहा है। इस प्रकार किसानों को कर्ज देने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य है। किसान क्रेडिट कार्ड ने किसानों को कर्ज उपलब्ध कराने में एक क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है। पिछले वर्ष ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाने के लिए’भावांतर’ जैसी नवाचारी योजना प्रारंभ की है। सिंचाई का रकबा भी इन वर्षों में बढ़ा है। प्रदेश में वर्ष 2003 में जहाँ सिर्फ सात लाख हेक्टेयर के आसपास सिंचित भूमि थी। प्रदेश सरकार के प्रयासों से अब यह 40 लाख हेक्टेयर से अधिक हो गई है। नहरों के फैलते जाल से आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश में 60 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता देखने को मिलेगी।

            इन सब प्रयासों के अतिरिक्त भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सरकार ने किसानों के हित में निरंतर सराहनीय प्रयास किए हैं। इसके बावजूद कहना होगा कि अभी भी किसानों की स्थिति सुधारने के लिए बहुत काम किए जाने बाकी हैं। उस दिशा में सरकार प्रयासरत भी है। इसलिए किसानों को यह विचार करना चाहिए कि वह आज (1 जून) से जिस आंदोलन को प्रारंभ कर रहे हैं, वह कांग्रेस की राजनीति का प्रयोग न बन जाए। लोकतंत्र में अपनी माँगों को सरकार के समक्ष उठाना प्रत्येक व्यक्ति/वर्ग का अधिकार है। पिछले वर्ष भी जब किसानों ने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी माँग उठाई थी, तो सबने किसानों की आवाज को बुलंद करने के लिए अपना समर्थन दिया था। सरकार ने किसानों की कुछ माँगों को स्वीकार भी कर लिया था। जब विपक्ष ने देखा कि सब कुछ शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हो गया है। उसको राजनीति करने का अवसर ही नहीं मिला। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार को भी घेरने का मौका हाथ से निकल रहा है। तब कांग्रेस ने शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न किसान आंदोलन को भड़का दिया और उसे ऐसा अराजक रूप दिया कि प्रदेश की जनता दंग रह गई। किसानों के प्रति जो आम आदमी की सहानुभूति और संवेदनाएं थीं,उसको भी कांग्रेस की हिंसा ने चोट पहुँचाया था। हिंसा भड़काने के आरोप कांग्रेस पर अधिक मजबूत इसलिए हुए क्योंकि उसके नेता जनता को भड़काते हुए वीडियो में कैद हुए थे। ‘थाने में आग लगा दो और गाडिय़ों को जला दो’ इस प्रकार के आह्वान कांग्रेस ने नेताओं ने किया थे। बाद में हमने देखा कि कैसे किसानों की आड़ में असामाजिक तत्वों ने बच्चों और महिलाओं से भरी बसों और निजी वाहनों पर हमला किया। मंदसौर का इलाका आग में झौंक दिया गया। हिंसा की इस राजनीति में चार किसानों की जान भी चली गई। कांग्रेस के राजनीतिक चूल्हे की आग से भड़की इस हिंसा से किसानों को कोई लाभ नहीं पहुँचा, बल्कि किसानों के प्रति आम समाज में संवेदनाएं कम जरूर हुई थी।

            बहरहाल, प्रदेश के किसानों को ध्यान देना होगा कि उनकी संवेदनाओं के साथ फिर से कोई राजनीतिक छल न हो जाए और उनकी आड़ में ऐसे राजनीतिक दल अपनी राजनीति न चमका पाएं, जिन्होंने किसानों के लिए अपने शासन काल में कुछ नहीं किया। किसान अपनी माँगों को उठाएं, पूरी ताकत और एकजुटता के साथ प्रदर्शन करें, किंतु यह भी सुनिश्चित करें कि पिछले वर्ष की हिंसा का दोहराव न हो पाए। हिंसा हमारे पवित्र उद्देश्य और बुनियादी माँगों को भी कमजोर करती हैं। हिंसा किसी भी प्रकार से भली नहीं है। इसलिए सुनिश्चित करें कि आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हो।

लेखक लोकेन्द्र सिंह (लेखक विश्व संवाद केंद्र, भोपाल के कार्यकारी निदेशक हैं।)

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