विशेष : एक ऐसा गांव जहां बच्चे – बच्चे संस्कृत बोलते है


एमटीटी नेटवर्क। अगर आपको चलते फिरते छोटे -छोटे बच्चे संस्कृत बोलते दिखाई दें। गांवों की महिलाएं और खेतों में काम करने वाले किसान आपस में संस्कृत बोलते दिखाई दें तो आधुनिक परिवेश में यह किसी आश्चर्य से कम नहीं होगा। जी हां मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे राजगढ़ जिले में एक गांव है झिरी। झिरी को संस्कृत ग्राम का दर्जा प्राप्त है। इस गांव की विशेषता यह है कि यहां के बच्चे – बुजुर्ग सभी संस्कृत बोलते है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यहां कि अनपढ़ महिलाएं और मजदूर – किसान भी संस्कृत बोलते हैं। साथ ही अपने दैनिक जीवन में इसी भाषा का उपयोग करते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, आपको गांव के लगभग सत्तर प्रतिशत घरों के प्रवेश द्वारों पर संस्कृत गृहम लिखा दिखाई देगा। यह एक प्रकार की पदवी होती है। जिस घर के सभी सदस्य संस्कृत बोलते है उस घर को यह पदवी दी जाती है। साथ ही गांव मेें प्रवेश करते ही दिवारों पर संस्कृत में लिखे वाक्य, सुभाषितानि और संस्कृत में लिखे श्लोक मिल जाएंगे।

इस तरह हुई शुरूआत…

गांव के रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता उदय सिंह चौहान बताते हैं कि सन् 2003 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक केएस सुदर्शन का झिरी आना हुआ। झिरी आने के बाद गांव के लोगों ने गांव के विकास और संस्कार पक्ष को समृद्ध बनाने के लिए उनसे मदद मांगी। श्री सुदर्शन ने गांव वालों को सुझाव दिया कि वह संस्कृत को बढ़ावा दें। संस्कृत को बढ़ावा दिए बिना समग्र विकास नहीं हो सकता है। इसके बाद संस्कृत भारती के सहयोग से दो वर्ष के लिए विस्तारिका के रूप में विमला पन्ना को यहां भेजा गया। जो छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के चोगलीबहार गांव की रहने वाली थी।  इस महिला ने गांव में नित्य सुबह, दोपहर एवं शाम को गांव में चौपाल लगाकर, टोली बनाकर क्रमशः बच्चों, महिलाओं एवं पुरुष वर्ग को निःशुल्क संस्कृत संभाषण करना सीखाया। उनकी यह मेहनत रंग लाई और महज 6 माह में ही गांव के 70 फीसदी लोग संस्कृत समझने और बोलने लगे. इसके बाद कटनी के रहने वाले बाला प्रसाद तिवारी इस गांव में आये। वो भी गांव वालों को संस्कृत सीखाने लगे। कुछ दिनों बाद बाला प्रसाद तिवारी और विमला पन्ना की शादी के बंधन में बंध गए। उसके बाद दोनों दंपती ने गांव में संस्कृत को लेकर एक जन मुहिम छेड़ दिया। गांव के बच्चें को संस्कृत सीखाने के लिए बाला प्रसाद तिवारी और उनकी पत्नी विमला तिवारी ने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। गांव के शिशु मंदिर और शासकीय विद्यालय में वे जाकर पढ़ाने लगे। जो लोग संस्कृत सीखते गए, वे दूसरों को संस्कृत सीखाने लगे। इस तरह संस्कृत सीखने – सीखाने का कारवां बढ़ता गया। इस गांव को संस्कृत ग्राम बनाने वाले बाला प्रसाद तिवारी और विमला तिवारी बताते है कि यह सफर इतना आसान नहीं रहा। शुरू में लोग इससे कटते थे। खासकर के महिलाओं को जागरूक करना मुश्किल काम था। लेेेेकिन धीरे धीरे गांव वाले भी दिलचस्पी लेने लगे। गांव की बेटियों ने भी इस मुहिम में अपनी अहम भूमिका निभाई। इस गांव की रहने वाली लड़कियां शादी बाद अपने ससुराल में भी संस्कृत को बढ़ावा देती हैं।

संस्कृत के आने से हुए कई सामाजिक परिवर्तन : 

उदय सिंह चौहान बताते है कि संस्कृत के आने से गांव वालों के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ। गांव के बच्चे संस्कृत के साथ – साथ संस्कार की दृष्टि से भी समृद्ध हो गए। संघ के पहल के बाद गांव के  विद्यालय का जीर्णोद्धार हुुआ।परंपरागत जल संरचनाओं का नवीनीकरण और नई संरचनाओं का निर्माण हुआ। खेती को रासायनिक प्रयोगों से मुक्त करने की दिशा मेें पहल की गई। अब गांव में जैविक खेती होती है। पानी और अन्न की उपलब्धता पूरे साल रहती है। लोगों की शिक्षा और साक्षरता के लिए वैयक्तिक और सांगठनिक तौर पर कोशिश की जा रही है। गांव में भिन्न-भिन्न जाति वर्ग के लोग रहते हैं, लेकिन वैमनस्य का नामोनिशान नहीं हैै। समरसता की झलक चारों ओर सहज ही दिखती है।

गांव की रहने वाली कविता जो बारहवीं में पढ़ती है, संस्कृत में गायन को लेकर कई पुरस्कार जीत चुकी है। संस्कृत के विकास और विस्तार के बाद लोगों के रहन सहन और बात- व्यवहार पर भी व्यापक असर पड़ा। गांव के लोग व्यवहार कुशल होने के साथ – साथ सामाजिक कार्यों के प्रति भी सजग हो गए। गांव के लोगों ने संस्कृत के साथ – साथ स्वच्छता, शिक्षा, नशाखोरी आदि के लिए भी सकारात्मक पहल करना शुरू कर दिया। आज झिरी को प्रभात ग्राम का दर्जा प्राप्त है।

देश – विदेश से आते है लोग : 

गांव के रहने वाले युवा महेंद्र सिंह बताते है कि इस को देखने समझने के लिए देश – विदेश से लोग आते है। कई बार तो विदेशी महिनों तक रूक कर गांव के बारे में अध्ययन करते हैं। इस गांव को लेकर कई डॉक्यूमेंट्री भी बन चुकी है। कई लोग इस गांव पर शोध अध्ययन कर रहे हैं।

कैसे पहुंचे झिरी: 

झिरी भोपाल से लगभग 180 किलोमिटर की दूरी पर है। आप स्वयं की गाड़ी से बस से झिरी तक का सफर आसानी से कर सकते है। आपको सबसे पहले नरसिंहपुर पहुंचना होगा । उसके बाद संदौता पहुंचना होगा। कई बसें सीधे संदौता तक भी जाती है। संदौता से आप लोकल गाड़ी कर झिरी जा सकते हैं।

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