कर्नाटक चुनाव : जिसकी लाठी उसकी भैंस

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एमटीटी नेटवर्क। कर्नाटक में सच में नाटक बहुत है. अभी तक किसी भी दल के पास पूर्ण बहुमत नहीं था. सभी अपनी अपनी सरकार बनाने का दावा कर रहे थे. एक तरफ 104 सीटों के साथ यदियुरप्पा सरकार बनाने की कवायद शुरू कर रहे थे तो दूसरी तरफ कुमार स्वामी जेडीएस और कांग्रेस की गठबंधन वाली सरकार बनाने का दावा पेश कर रहे थे. तब गेंद राज्यपाल के पाले में थी. आखिरकार राज्यपाल अपना फैसला सुना दिया. राज्यपाल का फैसला भी उम्मीदों के अनुरूप ही आया. राज्यपाल ने बड़ी पार्टी होने के नाते बीजेपी को सरकार बनाने का मौका दिया. साथ ही बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय भी दिया. आनन फानन मेें कांग्रेेेस सुप्रीम कोर्ट पहुंची लेकिन वहां भी उसे निराशा ही हाथ लगी.

अब यदियुरप्पा बहुमत साबित कर पाएंगे कि नहीं यह तो बाद का विषय है लेकिन अब राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं उसपर गौर करना आवश्यक है.

कांग्रेस आरोप लगा रही है कि उसके पास पर्याप्त संख्या बल था तो उसे सरकार बनाने का मौका क्यों नहीं मिला. कांग्रेस ने गोवा, मणिपुर और मेघालय का उदाहरण भी दिया. कांग्रेस ने कहा कि इन तीनों ही राज्यों में कांग्रेस बड़ी पार्टी थी लेकिन राज्यपाल ने बीजेपी को बहुमत के नाम पर मौका दिया था तो अब उसी आधार पर कांग्रेस को भी मौका मिलना चाहिए.  कांग्रेस की यह मांग गलत नहीं है. लेकिन पेंच फंस गया राज्यपाल के स्व विवेक का. यह कोई पहली बार नहीं है कि

राज्यपाल ने किसी विशेष दल के साथ नरमी बरती और सरकार बनाने का मौका दिया. भारत के इतिहास में यह पुरानी परंपरा रही है कि जिसका राज्यपाल होता है उसी को राज्यपाल ने मौका भी दिया है. अर्थात जिसकी लाठी उसकी भैंस. इसके पहले भी ऐसे कई उदाहरण जिसने यूपीए सरकार और कांग्रेस को सीधे सीधे लाभ पहुंचाया.

बूटा सिंह ने 22 मई, 2005 की मध्यरात्रि को बिहार विधानसभा भंग कर दी. उस साल फ़रवरी में हुए चुनावों में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त हुआ था.इसके ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस पर फ़ैसला सुनाते हुए कोर्ट ने बूटा सिंह के फ़ैसले को असंवैधानिक बताया था.उसी तरह 1998 में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया. जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. कल्याण सिंह ने इस फ़ैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी. कोर्ट ने राज्यपाल के फ़ैसले को असंवैधानिक करार दिया. जगदंबिका पाल दो दिनों तक ही मुख्यमंत्री रह पाए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद कल्याण सिंह फिर से मुख्यमंत्री बने.इसी तरह कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने अपने कार्यकाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया था. उस समय बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री थे. ऐसे में अगर आज राज्यपाल ने सरकार बनाने का मौका दिया है तो क्या गलत किया है. यहां भी राज्यपाल ने पुरानी परंपरा का निर्वहन ही तो किया है.

इंद्रभूषण मिश्र।

संपादक माय टाइम्स टुडे। 

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