आईए विस्तार से जानें महाभियोग और उसका इतिहास

अभी देश में महाभियोग को लेकर चर्चाओं का बाजार अपने उफान पर है. विपक्ष सीजेआई पर महाभियोग लाने के लिए अड़ा हुआ है. ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि आखिर महाभियोग क्या होता है?

सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के किसी जज को हटाने के लिए महाभियोग का प्रावधान संविधान की धारा 124 ( 4 ) में किया गया है, जिसे महाभियोग कहा जाता है.
नियम के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जज के ख़िलाफ़ महाभियोग लाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में दिया जा सकता है. अगर प्रस्ताव राज्य सभा में लाना हो तो कम से कम 50 राज्यसभा सांसदों का समर्थन और अगर लोकसभा में लाना हो तो कम से कम 100 लोकसभा सांसदों का समर्थन अनिवार्य है.

अगर यह प्रस्ताव दोनों सदनों में लाया गया है तो दोनों सदनों के अध्यक्ष मिलकर एक संयुक्त जांच समिति बनाते हैं.जांच पूरी हो जाने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट स्पीकर या अध्यक्ष को सौंप देती है जो उसे अपने सदन में पेश करते हैं.अगर जांच में पदाधिकारी दोषी साबित हों तो सदन में वोटिंग कराई जाती है.प्रस्ताव पारित होने के लिए उसे सदन के कुल सांसदों का बहुमत या वोट देने वाले सांसदों में से कम से कम दो तिहाई का समर्थन मिलना ज़रूरी है. अगर दोनों सदन में ये प्रस्ताव पारित हो जाए तो इसे मंज़ूरी के लिए राष्ट्रपति को भेजा जाता है.किसी जज को हटाने का अधिकार सिर्फ़ राष्ट्रपति के पास होता है.

सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामास्वामी को महाभियोग का सामना करने वाला पहला जज माना जाता है. उनके ख़िलाफ़ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था. यह प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया क्योंकि उस वक़्त सत्ता में मौजूद कांग्रेस ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया और प्रस्ताव को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला.

उसी तरह कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन देश के दूसरे ऐसे जज थे, जिन्हें 2011 में अनुचित व्यवहार के लिए महाभियोग का सामना करना पड़ा. यह भारत का अकेला ऐसा महाभियोग का मामला है जो राज्य सभा में पास होकर लोकसभा तक पहुंचा. हालांकि लोकसभा में इस पर वोटिंग होने से पहले ही जस्टिस सेन ने इस्तीफ़ा दे दिया था. इसी तरह देश मेें अन्य मामले भी आये हैं पर किसी पर अभीतक महाभियोग लगा नहीं है.

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