बंगाल की कांवड़ यात्रा के बारे में कितना जानते हैं आप

यूपी और बिहार के कांवड़ यात्रा के बारे में तो आपने बहुत सुना होगा. लेकिन बंगालियों के कांवड़ यात्रा के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी होती है. हालांकि बंगाल शक्ति पूजा और देवी मां की अराधना के लिए मशहूर है. लेकिन यहां कांवड़ यात्रा भी कम मायने नहीं रखती हैं.

अभी बंगाली नववर्ष शुरू हुआ है. इस समय राज्य के हुगली जिले और सुंदरबन के कई क्षेत्रों में सड़कों पर एक लाइन में तेजी से आगे बढ़ते सैकड़ों लोग दिखते हैं. ये बंगाल के कांवड़िये हैं. कांधे पर बांस की कांवड़ और उसके दोनों सिरों पर छोटे-छोटे कलश में गंगाजल लिए ऐसे लोगों का जत्था 300 साल पुराने तारकेश्वर शिव मंदिर की यात्रा पर हर साल जाता है. तारकेश्वर मंदिर कोलकाता से 60 किमी दूर उत्तर की तरफ है. कोलकाता से दिल्ली जाने के सड़कमार्ग पर यह मंदिर स्थित है.

तारकेश्वर मंदिर : ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव यहां तारक मंत्र देते हैं. इसलिए उन्हें तारकेश्वर कहा गया है. कहा जाता है कि यहां भक्तजन जो भी मन्नत मांगते हैं उनकी मन्नत पूरी होती है. इस मंदिर का निर्माण साल 1729 में राजा भारमल्ल ने कराया था.

बंगाली वर्ष के आखिरी हफ्ते में मनाया जाने वाला यह त्योहार भगवान शिव, नील और धर्मठाकुर को समर्पित होता है. इसी दौरान कांवड़िए कलशों में गंगाजल भरकर तारकेश्वर मंदिर की तीन दिन की यात्रा पर निकलते हैं और आखिरी दिन यह जल शिव को अर्पित करते हैं.

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