साक्षात्कार: प्राकृतिक खेती के माध्यम से पर्यावरण बचाने का जामवंती प्रयास

प्राकृतिक खेती के बारें में चर्चा करते हुए पतंजलि झा जी


MY TIMES TODAY. पतंजलि झा भारतीय राजस्व विभाग में आयुक्त है.वह वर्तमान में भोपाल में रहते है. दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से पढ़ाई करने के बाद श्री झा जी ने 1986 में भारतीय राजस्व विभाग में आयुक्त पद पर अपनी सेवा देना शुरू किया. झा जी हमेशा से समाज और लोक कल्याणकारी जन सरोकारों से जुड़े रहे है. पिछले 14 सालों से वह मध्यप्रदेश में प्राकृतिक खेती के माध्यम से न सिर्फ खेती को प्रोत्साहित कर रहे हैं बल्कि अपने इस अनूठे प्रयोग से पर्यावरण को बचाने का असाधारण कार्य भी कर रहे है. झा जी इस प्रयोग को रोजगार या पैसा कमाने का जरिया न बना के लोकहित में पर्यावरण बचाने और जन जागरूकता फैलाने का कार्य कर रहे है.


जब हमने झा जी से उनके सफर और कार्य के बारे में जानने की कोशिश की तो उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में देश को पांच भयावह चुनौतियों से निपटना है.
ये पांच चुनौतियां है : कैंसर, जल संरक्षण, ग्लोबल वॉर्मिंग, मिट्टी-मृदा और रोजगार.
अगर हमने वक्त रहते इन पांचों चुनौतियों पर अमल नहीं किया तो हमें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते है. अगर हम अपनी प्राकृतिक वन संपदा का सही रूप से प्रयोग करें हम इन पांचों चुनौतियों से निपट सकते है.

साक्षात्कार की पूरी वीडियो यहां देखें  just click..

झा जी से बात-चीत के प्रमुख अंश…..

लागत कम मुनाफा ज्यादा : 

झा जी बताते है कि इस तरह की खेती का स्वास्थ्य लाभ तो है ही साथ ही इसमें मुनाफा भी अधिक है.इस तरह की खेती में न तो बाहर से खाद उर्वरक आदि की जरूरत है न ही बार बार सिंचाई की आवश्यकता है.एक बार की सिंचाई के बाद बहुत दिनों तक जमीन में नमी बनी रहती है. वर्तमान समय में इस प्रकार की खेती से प्राप्त उत्पादों की मांग भी अधिक है.

प्राकृतिक रूप से तैयार खस और अन्य पौधे जो मल्टी लेयर फार्मिंग के तर्ज पर लगाए गए है..

क्या है मल्टी लेयर फार्मिंग:
मल्टी लेयर फार्मिंग का मतलब एक खेत में एक सीजन में एक साथ कई फसलें उगाना है. वन्य ऑर्गेनिक फार्म में काम करने वाले विक्रम ने बताया कि हम एक साथ कई फसले एक ही सीजन में उगाते है.उन्होंने बताया कि खस, अदरक, हल्दी, पपीता, मोरिंगा आदि फसले मल्टी लेयर फार्मिंग के तहत तैयारी की जाती है.इससे लागत भी बहुक कम लगती है और मुनाफा भी आम खेती की तुलना में आठ गुना ज्यादा होता है.

हमें अपनी मृदा को बचाने के लिए कारगर उपाय करने की जरूरत है.वर्तमान समय में हमारी मिट्टी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है.यूएन की मानें तो भारतीय मिट्टी सबसे खराब मिट्टी में से एक है.वही इसरो भी भारतीय मृदा को लेकर चिंता व्यक्त कर चुका है.

न खाद की जरूरत न कोई केमिकल कीटनाशक की आवश्यकता : 

झा जी ने बताया कि वन में खेती करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां आपको न तो खाद की जरूरत है और न ही किसी कीटनाशक की आवश्यकता है. वन में लगे पौधों की पत्तियां ही सूखने के बाद खाद का कार्य करती है.वह फसल की पैदावार बढ़ाने के साथ – साथ मृदा शक्ति को भी बढ़ाती है.

हर जगह बढ़ रही प्राकृतिक उत्पादों की मांग: 

झा जी ने बताया कि आज कल प्राकृतिक रूप से तैयार किए गए उत्पादों की मांग बढ़ रही है.लोग स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्राकृतिक खेती से प्राप्त उत्पादों कों अपने दैनिक जीवन में अपना रहे है.

गिलोय मतलब हर मर्ज के लिए रामबाण…

मोरिंगा मतलब सम्पूर्ण औषधि:

मोरिंगा या सहजन की फली, हरी और सूखी पत्तियों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम , पोटेशियम, आयरन, मैग्रीशियम, विटामिन ए, बी,सी और बी कॉम्प्लेक्स प्रचुर मात्रा में पाया जाता है.इसमें दूध की तुलना में चार गुना कैल्शियम और दोगुना प्रोटीन पाया जाता है.गाजर से चार गुना विटामिन A, पालक से 25 गुना आयरन, केले से तीन गुना अधिक पोटेशियम, संतरे से 7 गुना विटामिन C और दही से दो गुना अधिक प्रोटिन होता है.


फायदे : ब्लड प्रेशर और मोटापा से बचाता है.सहजन की फली की सब्जी खाने से पुराने गठिया, जोड़ों के दर्द, वायु संचय, वात रोगों में लाभ होता है.इसका जूस गर्भवती को देने की सलाह दी जाती है.इससे प्रसव में होने वाली समस्या से राहत मिलती है और प्रसव के बाद भी मां को तकलीफ कम होती है.

प्राकृतिक रूप से तैयार हल्दी के पौधे…

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इंद्रभूषण
Journalist | Website

INDRABHUSHAN KUMAR

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